ययातिदौहित्रपुण्यसमुच्चयः | Yayāti and the Grandsons’ Consolidation of Merit
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें गालवचरित्रके प्रयंगमें ययातिमोहविषयक एक सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १२० ॥। अपना छा | क्र एकविशर्त्याधेकशततमो< ध्याय: ययातिका स्वर्गलोकसे पतन और उनके दौह्रित्रों, पुत्री तथा गालव मुनिका उन्हें पुनः स्वर्गलोकमें पहुँचानेके लिये अपना-अपना पुण्य देनेके लिये उद्यत होना नारद उवाच अथ प्रचलित: स्थानादासनाच्च परिच्युत: । कम्पितेनेव मनसा धर्षित: शोकवल्लिना,नारदजी कहते हैं--राजन्! तत्पश्चात् ययाति अपने सिंहासनसे गिरकर उस स्वर्गीय स्थानसे भी विचलित हो गये। उनका हृदय काँप-सा उठा और शोकाग्नि उन्हें दग्ध करने लगी
nārada uvāca | atha pracalitaḥ sthānād āsanācca paricyutaḥ | kampiteneva manasā dharṣitaḥ śokavallinā ||
ນາຣະດະເວົ້າວ່າ: ແລ້ວຍະຍາຕິ ຖືກສັ່ນຄອນອອກຈາກຖານະແຫ່ງສະຫວັນ ແລະຕົກລົງຈາກບັນລັງຂອງຕົນ. ຈິດໃຈຂອງລາວສັ່ນໄຫວດັ່ງຖືກກະທົບ ແລະຖືກຄວາມໂສກເສົ້າທີ່ເລື້ອຍຄືວັນລະຍາພັນຮັດ ລຸກລາມຄອບງໍາ.
नारद उवाच