Cāturāśramya-dharma—Marks of the Four Āśramas (चातुराश्रम्यधर्मः)
सर्वोद्योगैराश्रमं धर्ममाहु: क्षात्रं श्रेष्ठ सर्वधर्मोपपन्नम् । स्व॑ स्व॑ धर्म येन चरन्ति वर्णा- स्तांस्तान् धमनन्यथार्थान् वदन्ति,जनसाधारणके लिये व्यवहार आरम्भ होनेपर राजा प्रिय और अप्रियकी भावनाका प्रयत्नपूर्वक परित्याग करे। भिन्न-भिन्न उपायों, नियमों, पुरुषार्थों तथा सम्पूर्ण उद्योगोंके द्वारा चारों वर्णोकी स्थापना एवं रक्षा करनेके कारण क्षात्रधर्म एवं गृहस्थ-आश्रमको ही सबसे श्रेष्ठ तथा सम्पूर्ण धर्मोंसे सम्पन्न बताया गया है; क्योंकि सभी वर्णोके लोग उस क्षात्र- धर्मके सहयोगसे ही अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं। क्षत्रियधर्मके न होनेसे उन सब धर्मोका प्रयोजन विपरीत होता है; ऐसा कहते हैं
sarvodyogair āśramaṃ dharmam āhuḥ kṣātraṃ śreṣṭhaṃ sarvadharmopapannam | svaṃ svaṃ dharmaṃ yena caranti varṇās tāṃs tān dharmān anyathārthān vadanti ||
ອິນທຣາກ່າວວ່າ: «ດ້ວຍຄວາມພາກເພັງທຸກປະການ ຜູ້ຄົນປະກາດວ່າ ອຳນາດກະສັດ (kṣātra) ທີ່ນຳໃຊ້ເປັນທຳມະ ແມ່ນຍອດເຢັ້ນ ແລະຄົບຖ້ວນດ້ວຍອົງປະກອບແຫ່ງຄວາມຊອບທຳທັງປວງ. ເພາະດ້ວຍການອຸປະຖຳຂອງ kṣātra-dharma ນັ້ນ ວັນນະຕ່າງໆ ຈຶ່ງສາມາດປະພຶດຫນ້າທີ່ຂອງຕົນໄດ້. ດັ່ງນັ້ນ ພວກເຂົາຈຶ່ງກ່າວວ່າ ຖ້າຂາດ kṣātra-dharma ແລ້ວ ຫນ້າທີ່ເຫຼົ່ານັ້ນຈະເສຍເປົ້າໝາຍອັນຖືກທຳນອງ ແລະກັບກັນຕໍ່ຈຸດປະສົງເດີມ»។
इन्द्र उवाच