अध्याय ५७ — राज्ञः नित्यप्रयत्नः, रक्षा-प्रधानता, तथा त्याग-नीतिः
Chapter 57: Constant Royal Vigilance, Primacy of Protection, and Principles of Dismissal
अरक्षितारं राजानं भार्या चाप्रियवादिनीम् | ग्रामकामं च गोपालं वनकामं॑ च नापितम्,'जैसे समुद्रकी यात्रामें टूटी हुई नौकाका त्याग कर दिया जाता है, उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्यको चाहिये कि वह उपदेश न देनेवाले आचार्य, वेदमन्त्रोंका उच्चारण न करनेवाले ऋत्विज्, रक्षा न कर सकने-वाले राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, गाँवमें रहनेकी इच्छा रखनेवाले ग्वाले और जंगलमें रहनेकी कामना करनेवाले नाई--इन छ: व्यक्तियोंका त्याग कर दे”
arakṣitāraṁ rājānaṁ bhāryā cāpriyavādinīm | grāmakāmaṁ ca gopālaṁ vanakāmaṁ ca nāpitam ||
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: “ຄວນລະທິ້ງກະສັດຜູ້ບໍ່ອາດປົກປ້ອງໄດ້, ເມຍຜູ້ເວົ້າຄໍາຮ້າຍ, ຄົນລ້ຽງງົວ (gopāla) ຜູ້ຫວັງແຕ່ຊີວິດໃນບ້ານ, ແລະຊ່າງຕັດຜົມ (nāpita) ຜູ້ປາຖະໜາປ່າ. ຄົນເຫຼົ່ານີ້ບໍ່ເໝາະກັບບົດບາດຂອງຕົນ ຈຶ່ງຄວນຖືກລະທິ້ງ—ເຫມືອນການຖິ້ມເຮືອທີ່ແຕກໃນການເດີນທາງຂ້າມທະເລ.”
भीष्म उवाच