Nāga–Nāgabhāryā Saṃvāda: Varṇa-Dharma, Gṛhastha-Discipline, and Mokṣa-Self-Inquiry
Mahābhārata 12.347
ततस्तं वचन प्राह ज्येष्ठो धर्मात्मज: प्रभु: । क इज्यते द्विजश्रेष्ठ दैवे पित्रये च कल्पिते,तब धर्मके ज्येष्ठ पुत्र नरने उनसे इस प्रकार पूछा--'द्विजश्रेष्ठ! तुम बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य हो। तुम्हारे द्वारा देवकार्य और पितृकार्यके सम्पादित होनेपर उन कर्मोंस किसकी पूजा सम्पन्न होती है? यह मुझे शास्त्रके अनुसार बताओ। तुम यह कौन-सा कर्म करते हो? और इसके द्वारा किस फलको प्राप्त करना चाहते हो?
tatas taṁ vacanaṁ prāha jyeṣṭho dharmātmajaḥ prabhuḥ | ka ijyate dvijaśreṣṭha daive pitrye ca kalpite ||
ແລ້ວ ຍຸທິສຖິຣະ—ບຸດອາວຸໂສຂອງ ທັມມະ ແລະເປັນຈອມເຈົ້າ—ໄດ້ກ່າວກັບທ່ານວ່າ: “ໂອ ດວິຊະຜູ້ປະເສີດ, ເມື່ອພິທີທີ່ຈັດໄວ້ສຳລັບເທວະດາ ແລະສຳລັບບັນພະບຸລຸດ ຖືກປະກອບຢ່າງຖືກຕ້ອງແລ້ວ, ແທ້ຈິງແລ້ວ ຜູ້ໃດແມ່ນຖືກບູຊາຜ່ານການກະທຳນັ້ນ? ຈົ່ງບອກຂ້ອຍຕາມຄຳພີ. ທ່ານປະກອບພິທີໃດ, ແລະປາດຖະນາຜົນໃດຈາກມັນ?”
वैशमग्पायन उवाच