Nāga–Nāgabhāryā Saṃvāda: Varṇa-Dharma, Gṛhastha-Discipline, and Mokṣa-Self-Inquiry
Mahābhārata 12.347
प्रोक्ष्यापसव्यं देवेश: प्राडुमुख: कृतवान् स्वयम् । मर्यादास्थापनार्थ च ततो वचनमुक्तवान्,अपने ही विधानसे प्रभुने वे तीनों पिण्ड संकल्पित किये। फिर अपने शरीरकी ही गर्मीसे उत्पन्न हुए स्नेहयुक्त तिलों द्वारा अपसव्यभावसे उन पिण्डोंका प्रोक्षण किया। तदनन्तर देवेश्वर श्रीहरिने स्वयं ही पूर्वाभिमुख हो प्रार्थना की और धर्म-मर्यादाकी स्थापनाके लिये यह बात कही
prokṣyāpasavyaṁ deveśaḥ prāṅmukhaḥ kṛtavān svayam | maryādāsthāpanārthaṁ ca tato vacanam uktavān ||
ເມື່ອພຣະອົງພອຍນ້ໍາໃນອາການອະປະສະວະ (apasavya) ແລ້ວ, ຈອມເທວະໄດ້ຫັນໜ້າໄປທາງຕາເວັນອອກດ້ວຍພຣະອົງເອງ. ແລະເພື່ອສ້າງຂອບເຂດອັນຖືກຕ້ອງແຫ່ງທັມມະ ແລະ ລະບຽບສັງຄົມ-ສາສະໜາ, ພຣະອົງໄດ້ກ່າວຖ້ອຍຄໍາຕໍ່ໄປນີ້.
नारद उवाच