(३) नरेश्वर! यदि ऐसा मानते हो कि युद्ध करनेवाले दो व्यक्तियोंमेंसे एकका मरना निश्चित ही है, अर्थात् वह स्वभाववश हठात् मारा गया है, तब तो स्वभाववादीके अनुसार भूत या भविष्य कालमें किसी अशुभ कर्मसे न तो तुम्हारा सम्पर्क था और न होगा ही ।। अथाभिपत्तिलोंकस्य कर्तव्या पुण्यपापयो: । अभिपन्नमिदं लोके राज्ञामुद्यतदण्डनम्,(४) यदि कहो, लोगोंको जो पुण्यफल (सुख) और पापफल (दुःख) प्राप्त होते हैं, उनकी संगति लगानी चाहिये; क्योंकि बिना कारणके तो कोई कार्य हो नहीं सकता; अतः प्रारब्ध ही कर्ता है तो उस कारणभूत प्रारब्धको धर्माधर्म रूप ही मानना होगा, धर्माधर्मका निर्णय शास्त्रसे ही होता है और शास्त्रके अनुसार जगत्में उद्दण्ड मनुष्योंको दण्ड देना राजाओंके लिये सर्वथा युक्तिसंगत है; अतः किसी भी दृष्टिसे तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये
nareśvara! yadi evaṃ manyase yuddha-kārayor dvayor madhye ekasya maraṇaṃ niyataṃ, sa svabhāvavaśād haṭhāt hata iti, tadā svabhāvavādināṃ mate bhūta-bhaviṣya-kālayoḥ aśubha-karmaṇā na tava saṃsparśo 'bhūt na ca bhaviṣyati. athābhipatti-lokasya kartavyā puṇya-pāpayoḥ; abhipannam idaṃ loke rājñām udyata-daṇḍanam.
ວະຍາສະກ່າວວ່າ: «ໂອ ພຣະຣາຊາຜູ້ເປັນເຈົ້າແຫ່ງມະນຸດ, ຖ້າເຈົ້າເຫັນວ່າ ໃນການຕໍ່ສູ້ຂອງນັກຮົບສອງຄົນ ການຕາຍຂອງຄົນໜຶ່ງແມ່ນຫຼີກບໍ່ພົ້ນ—ຖືກຟັນລົງຢ່າງກະທັນຫັນໂດຍທຳມະຊາດ—ແລ້ວຕາມທັດສະນະຂອງຜູ້ເຊື່ອທຳມະຊາດ ເຈົ້າບໍ່ເຄີຍມີສ່ວນພົວພັນກັບການກະທຳຊົ່ວໃນອະດີດ ແລະກໍຈະບໍ່ມີໃນອະນາຄົດ. ແຕ່ຖ້າເຈົ້າກ່າວວ່າ ຄວາມສຸກແລະຄວາມທຸກຂອງຜູ້ຄົນຕ້ອງຖືກຕິດຕາມໄປຫາບຸນແລະບາບ—ເພາະບໍ່ມີຜົນໃດເກີດຂຶ້ນໂດຍບໍ່ມີເຫດ—ແລ້ວຊະຕາກຳອັນເປັນເຫດນັ້ນ ຕ້ອງເຂົ້າໃຈວ່າມີຮູບເປັນ ທຳມະ ແລະ ອະທຳມະ, ຊຶ່ງຖືກກຳນົດໂດຍຄຳພີ. ແລະຕາມມາດຕະຖານຂອງຄຳພີນັ້ນເອງ ການທີ່ກະສັດຍົກໄມ້ທັນດາ (ອຳນາດລົງໂທດ) ເພື່ອລົງໂທດຜູ້ອັນອຸດຕະລິດ ແມ່ນຖືກຕ້ອງຢ່າງຍິ່ງ. ດັ່ງນັ້ນ ຈາກທັງສອງທັດສະນະ ເຈົ້າບໍ່ມີເຫດໃດຈະໂສກເສົ້າ».
व्यास उवाच
Vyāsa offers a two-pronged argument to dissolve grief: if one adopts strict naturalism (svabhāva), then no moral blame attaches; if one adopts karmic causality, then dharma/adharma—known through śāstra—grounds royal punishment, making the king’s enforcement of order ethically justified.
In Śānti Parva’s instruction to the king, Vyāsa addresses the king’s sorrow and moral doubt about violence and responsibility, arguing that whether one explains death by nature or by karma, the king’s duty to punish the unruly remains proper and grief is unwarranted.