Śānti-parva Adhyāya 30: Nārada–Parvata Samaya-bhaṅga, Śāpa, and the Marriage of Sukumārī
ऑपन-आक्ात [छ। अकाल $३-अम्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम--ये सात सोम-संस्थाएँ हैं। २-पहले द्रोणपर्वमें जो सोलह राजाओंके प्रसंग आये हैं, उनमें और यहाँके प्रसंगमें पाठभेदोंके कारण बहुत अन्तर देखा जाता है। वहाँ भरतके द्वारा यमुनातटपर सौ, सरस्वतीतटपर तीन सौ और गंगातटपर चार सौ अश्वमेध यज्ञ किये गये थे--यह उल्लेख है। - “शम्या' एक ऐसे काठके डंडेको कहते हैं, जिसका निचला भाग मोटा होता है। उसे जब कोई बलवान् पुरुष उठाकर चोरसे फेंके, तब जितनी दूरीपर जाकर वह गिरे, उतने भूभागको एक “शम्यापात” कहते हैं। इस तरह एक-एक शम्यापातमें एक-एक यज्ञवेदी बनाते और यज्ञ करते हुए राजा ययाति आगे बढ़ते गये। इस प्रकार चलकर उन्होंने भारतभूमिकी परिक्रमा की थी। - यह षोडश राजाओंका उपाख्यान द्रोणपर्वके पचपनवें अध्यायसे लेकर इकहत्तरवें अध्यायतक पहले आ चुका है। उसीको कुछ संक्षिप्त करके पुनः यहाँ लिया गया है। पहलेका परशुरामचरित्र इसमें संगृहीत नहीं हुआ है और पहले जो राजा पौरवका चरित्र आया था, उसके स्थानमें यहाँ अंगराज बृहद्रथके चरित्रका वर्णन है। कथाओंके क्रममें भी उलटा- पलटी हो गयी है। श्लोकोंके पाठोंमें भी कई जगह भेद दिखायी देता है। त्रिशोड्थ्याय: महर्षि नारद और पर्वतका उपाख्यान युधिछिर उवाच स कथं कांचनष्ठीवी सृंजयस्य सुतो5भवत् | पर्वतेन किमर्थ वा दत्तस्तेन ममार च,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्! पर्वत मुनिने राजा सूंजयको सुवर्णष्ठीवी नामक पुत्र किसलिये दिया और वह क्यों मर गया?
yudhiṣṭhira uvāca |
sa kathaṃ kāñcanaṣṭhīvī sṛñjayasya suto 'bhavat |
parvateṇa kimarthaṃ vā dattas tena mamāra ca ||
ຢຸທິສຖິຣະກ່າວວ່າ: «ກາຍເປັນບຸດຂອງ ສຣຶນຈະຍ ໄດ້ແນວໃດ ກາຍເປັນ ກາັນຈະນະສຖີວີ? ແລະເພາະເຫດໃດ ິສີ ປະຣະວະຕະ ຈຶ່ງປະທານເຂົາ—ແລະເປັນຫຍັງເຂົາຈຶ່ງຕາຍ?»
युधिछिर उवाच