कामद्रुम-रूपकः तथा शरीर-पुर-रूपकः
The Desire-Tree and the Body-as-City Metaphors
लक्षण तु प्रसादस्य यथा स्वप्ने सुखं स्वपेत् । निवाते वा यथा दीपो दीप्यमानो न कम्पते,मनुष्य नींदके समय जैसे सुखसे सोता है--सुषुप्तिके सुखका अनुभव करता है, अथवा जैसे वायुरहित स्थानमें जलता हुआ दीपक कम्पित नहीं होता, एकतार जला करता है, उसी प्रकार मन कभी चंचल न हो, यही उसके प्रसादका अर्थात् परम शुद्धिका लक्षण है गन्ध, नासिका और शरीर--ये तीनों भूमिके गुण हैं। इस प्रकार इन्द्रियसमुदायसहित यह शरीर पाञज्चभौतिक बताया गया है
lakṣaṇaṁ tu prasādasya yathā svapne sukhaṁ svapet | nivāte vā yathā dīpo dīpyamāno na kampate ||
ວະຍາສະ ກ່າວວ່າ: ເຄື່ອງໝາຍແຫ່ງຄວາມແຈ້ງໃສພາຍໃນ (prasāda) ແມ່ນດັ່ງນີ້: ເຫມືອນຄົນນອນຢ່າງສຸກສະບາຍໃນການນອນ ລິ້ມລອງຄວາມຜ່ອນຄາຍແຫ່ງການພັກລຶກ; ແລະເຫມືອນໂຄມໄຟທີ່ໄໝ້ຢູ່ໃນບ່ອນບໍ່ມີລົມ ບໍ່ກະພື້ນແຕ່ສ່ອງສະຫວ່າງຢ່າງຄົງທີ່—ດັ່ງນັ້ນເມື່ອຈິດຖືກຊຳລະຢ່າງແທ້ ມັນຈະບໍ່ຫວັ່ນໄຫວ. ຄວາມໝັ້ນຄົງບໍ່ສັ່ນຄືນນີ້ແມ່ນເຄື່ອງໝາຍແຫ່ງຄວາມບໍລິສຸດພາຍໃນອັນສູງສຸດ.
व्यास उवाच