बलीन्द्रसंवादः — Kāla, Anityatā, and the Limits of Agency
Mahābhārata 12.217
भगवन्न्तमजं दिव्यं विष्णुमव्यक्तसंज्ञितम् । भावेन यान्ति शुद्धा ये ज्ञानतृप्ता निराशिष:,जो सम्पूर्ण ऐश्वर्योंसे युक्त, अजन्मा, दिव्य एवं अव्यक्त नामवाले भगवान् विष्णुकी भक्तिभावसे शरण लेते हैं, वे ज्ञानानन्दसे तृप्त, विशुद्ध और कामनारहित हो जाते हैं
ຜູ້ໃດທີ່ເຂົ້າພຶງພາພຣະວິດສະນຸ—ພຣະເຈົ້າຜູ້ຄົບຄອງອິດທິລິດທັງປວງ, ບໍ່ເກີດ, ທິບພະ, ແລະມີນາມວ່າ «ອະວະຍັກຕະ»—ດ້ວຍຈິດແຫ່ງພັກຕິ, ຜູ້ນັ້ນອິ່ມເຕັມດ້ວຍຄວາມອິ່ມໃນປັນຍາ, ບໍລິສຸດ ແລະປາສຈາກຄວາມປາຖະໜາ.
भीष्म उवाच