बलीन्द्रसंवादः — Kāla, Anityatā, and the Limits of Agency
Mahābhārata 12.217
इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें श्रीकृष्णसम्बन्धी अध्यात्मका कथनविषयक दो सौ सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २१६ ॥ अपना बछ। सं: सप्तदर्शाधिकद्विशततमो< ध्याय: सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग प्रकृति और पुरुष (जीवात्मा) उन चारोंके ज्ञानसे मुक्तिका कथन तथा परमात्मप्राप्तिके अन्य साधनोंका भी वर्णन भीष्म उवाच नस वेद पर ब्रह्म यो न वेद चतुष्टयम् । व्यक्ताव्यक्त च यत् तत्त्वं सम्प्रोक्ते परमर्षिणा,भीष्मजी कहते हैं--राजन! जो मनुष्य सच्चिदानन्दघन परमात्मा, दृश्यवर्ग तथा प्रकृति और पुरुष--इन चारोंको नहीं जानता है, वह परब्रह्म परमात्माको नहीं जानता है। परम ऋषि नारायणने जिस व्यक्त और अव्यक्त तत्त्वका प्रतिपादन किया है, उसमें व्यक्त (दृश्यवर्ग) को मृत्युके मुखमें पड़नेवाला जाने और अव्यक्तको अमृतपद समझे तथा नारायण ऋषिने जिस प्रवृत्तिरूप धर्मका प्रतिपादन किया है, उसीपर चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी प्रतिष्ठित है। निवृत्तिरूप जो धर्म है, वह अव्यक्त सनातन ब्रह्मस्वरूप है
bhīṣma uvāca | na sa veda paraṁ brahma yo na veda catuṣṭayam | vyaktāvyaktaṁ ca yat tattvaṁ samprokte paramarṣiṇā ||
ພີສະມະກ່າວວ່າ: ໂອ ພຣະຣາຊາ, ຜູ້ໃດບໍ່ເຂົ້າໃຈຄວາມເປັນຈິງສີ່ປະການ—ພຣະອາດຕະມະສູງສຸດອັນເປັນກ້ອນແຫ່ງສັດ-ຈິດ-ອານັນທະ, ໂລກທີ່ປາກົດໃຫ້ເຫັນ, ປະກຣິຕິ, ແລະ ປຸຣຸສະ (ຊີວາດຕະມະ)—ຜູ້ນັ້ນຍ່ອມບໍ່ຮູ້ຈັກພຣະພຣະຫມັນສູງສຸດຢ່າງແທ້ຈິງ. ມະຫາລະສີໄດ້ສອນຫຼັກຂອງສິ່ງທີ່ປາກົດ ແລະ ສິ່ງທີ່ບໍ່ປາກົດ; ຖ້າບໍ່ຈັບໃຈໝວດພື້ນຖານເຫຼົ່ານີ້ ຄວາມຮູ້ຕໍ່ສິ່ງສູງສຸດກໍບໍ່ຄົບຖ້ວນ.
भीष्म उवाच