जनक-राज्ञः मौण्ड्य-परिव्रज्या-विवादः
Janaka’s Renunciation Questioned; Discourse on Dāna and Detachment
योउत्यन्तं प्रतिगृह्लीयाद् यश्च दद्यात् सदैव हि | तयोस्त्वमन्तरं विद्धि श्रेयांस्ताभ्यां क उच्यते,“जो बराबर दूसरोंसे दान लेता (भिक्षा ग्रहण करता) तथा जो निरन्तर स्वयं ही दान करता रहता है, उन दोनोंमें क्या अन्तर है और उनमेंसे किसको श्रेष्ठ कहा जाता है? यह आप समझिये
«ຜູ້ທີ່ຮັບທານຈາກຄົນອື່ນຢູ່ເລື້ອຍ (ຜູ້ຂໍທານ) ແລະຜູ້ທີ່ໃຫ້ທານຢູ່ເລື້ອຍໆ—ຈົ່ງຮູ້ໃຫ້ແຈ້ງເຖິງຄວາມແຕກຕ່າງຂອງທັງສອງ; ແລະໃນສອງນັ້ນ ຜູ້ໃດຈຶ່ງຖືກເອີ້ນວ່າປະເສີດກວ່າ».
अजुन उवाच