Adhyāya 166: Kṛtaghna-doṣa (कृतघ्नदोषः) — the fault of ingratitude and the limits of expiation
तत्रैव लब्धभोजी स्याद् द्वादशाहात्स शुद्धयति । चरेत् संवत्सरं चापि तद् व्रतं येन कृन्तति,गोवध करनेवाला पापी उस गायकी एूँछको इस प्रकार धारण करे कि उसका बाल ऊपरकी ओर रहे। फिर मिट्टीका पात्र हाथमें लेकर प्रतिदिन सात घरोंमें भिक्षा माँगे और अपने पापकर्मकी बात कहकर लोगोंको सुनाता रहे। उन्हीं सात घरोंकी भिक्षामें जो अन्न मिल जाय, वही खाकर रहे। ऐसा करनेसे वह बारह दिनोंमें शुद्ध हो जाता है। यदि पाप अधिक हो तो एक वर्षतक उस व्रतका अनुष्ठान करे, जिससे वह अपने पापको नष्ट कर देता है
tatraiva labdhabhojī syād dvādaśāhāt sa śuddhyati | caret saṁvatsaraṁ cāpi tad vrataṁ yena kṛntati ||
ພີດສະມະກ່າວວ່າ: ໃຫ້ລາວດໍາລົງຊີວິດຢູ່ທີ່ນັ້ນດ້ວຍອາຫານທີ່ໄດ້ມາ; ໃນສິບສອງມື້ລາວຈະບໍລິສຸດ. ຖ້າບາບໜັກກວ່ານັ້ນ ໃຫ້ປະຕິບັດວຣະຕະນັ້ນໃຫ້ຄົບໜຶ່ງປີ—ດ້ວຍວຣະຕະນັ້ນ ລາວຈະຕັດຂາດແລະທໍາລາຍຄວາມເປື້ອນມົນແຫ່ງການກະທໍາຜິດຂອງຕົນ.
भीष्म उवाच