द्वे तस्य त्रीणि वर्षाणि चत्वारि सहसेविनि । कुचर: पज्चवर्षाणि चरेद् भैक्ष्यं मुनिव्रत:,इसी तरह व्यभिचारी पुरुषको बुद्धिमान् राजा लोहेकी तपायी हुई खाटपर सुलाकर ऊपरसे लकड़ी रख दे और आग लगा दे, जिससे वह पापी उसीमें जलकर भस्म हो जाय। महाराज! पतिकी अवहेलना करके परपुरुषोंसे व्यभिचार करनेवाली स्त्रियोंके लिये भी यही दण्ड है, उपर्युक्त कहे हुएमें जिन दुष्टोंके लिये प्रायश्चित्त बताया है, उनके लिये यह भी विधान है कि एक वर्षके भीतर प्रायश्चित्त न करनेपर दुष्ट पुरुषको दूना दण्ड प्राप्त होना चाहिये। जो मनुष्य दो, तीन, चार या पाँच वर्षोतक उस पतित पुरुषके संसर्गमें रहे, वह मुनिजनोचित व्रत धारण करके उतने ही वर्षोतक पृथ्वीपर घूमता हुआ भिक्षावृत्तिसे जीवन- निर्वाह करे
dve tasya trīṇi varṣāṇi catvāri sahasevini | kucaraḥ pañcavarṣāṇi cared bhaikṣyaṃ munivrataḥ ||
ພີສະມະກ່າວວ່າ: ຖ້າຜູ້ໃດໄດ້ຄົບຄົນກັບຊາຍຜູ້ຕົກທຳນັ້ນສອງ, ສາມ ຫຼື ສີ່ປີ ຜູ້ນັ້ນຕ້ອງຮັບວຣະຕະແບບມຸນີ ແລະດຳລົງຊີວິດດ້ວຍການຂໍທານ ພະເນຈອນໄປທົ່ວແຜ່ນດິນ ຕາມຈຳນວນປີເທົ່ານັ້ນ. ແຕ່ຜູ້ໃດຄົບຄົນກັບເຂົາຄົບຫ້າປີ ກໍຕ້ອງປະພຶດຊີວິດພະເນຈອນຂໍທານຫ້າປີເຊັ່ນກັນ.
भीष्म उवाच
Association with serious wrongdoing is treated as ethically consequential; purification requires proportionate, time-bound austerity—living as a mendicant under a sage-like vow for as many years as the association lasted.
Bhīṣma, instructing the king in Śānti Parva on law and expiation, specifies a graded penance: those who remained in the company of a fallen man for 2–5 years must wander and subsist on alms for the corresponding duration, as part of restoring dharmic order.