Śaraṇāgata-Atithi-Dharma in the Kapota Narrative (कपोत-आख्यानम्—शरणागतधर्मः)
चपच उवाच यद्येष हेतुस्तव खादने स्या- न्न ते वेद: कारण नार्यधर्म: | तस्माद् भक्ष्येडभक्षणे वा द्विजेन्द्र दोषं न पश्यामि यथेदमत्र,चाण्डालने कहा-द्विजेन्द्र! यदि इस अभक्ष्य वस्तु-को खानेमें आपके लिये यह प्राणरक्षारूपी हेतु ही प्रधान है तब तो आपके मतमें न वेद प्रमाण है और न श्रेष्ठ पुरुषोंका आचार-धर्म ही। अतः मैं आपके लिये भक्ष्य वस्तुके अभक्षणमें अथवा अभक्ष्य वस्तुके भक्षणमें कोई दोष नहीं देख रहा हूँ, जैसा कि यहाँ आपका इस मांसके लिये यह महान् आग्रह देखा जाता है
capaca uvāca yady eṣa hetus tava khādane syān na te vedaḥ pramāṇaṃ nārya-dharmaḥ | tasmād bhakṣyed abhakṣaṇe vā dvijendra doṣaṃ na paśyāmi yathā idam atra |
ຈະປະຈະ (ຊະວະປະຈະ) ກ່າວວ່າ: «ໂອ ດວິເຈນທຣະ! ຖ້າເຫດຜົນຕັດສິນໃຈທີ່ທ່ານກິນ ແມ່ນແຕ່ເພື່ອຮັກສາຊີວິດ ເທົ່ານັ້ນ, ໃນທັດສະນະຂອງທ່ານ ວິເທດກໍບໍ່ແມ່ນຫຼັກຖານ ແລະ ທຳຂອງຜູ້ດີຜູ້ສູງກໍບໍ່ແມ່ນມາດຕະຖານ. ດັ່ງນັ້ນ ໂອ ພຣາຫມັນຜູ້ປະເສີດ, ຂ້ອຍບໍ່ເຫັນໂທດໃດໆສໍາລັບທ່ານ ທັງໃນການບໍ່ກິນຂອງທີ່ກິນໄດ້ ຫຼື ໃນການກິນຂອງທີ່ຖືກຫ້າມ—ດັ່ງທີ່ເຫັນຢູ່ນີ້ຈາກຄວາມດື້ດຶນຢ່າງແຮງກ້າຂອງທ່ານຕໍ່ເນື້ອນີ້».
चपच उवाच