कृपोपदेशः — द्रौणेरनिद्रा च
Kṛpa’s Counsel and Drauṇi’s Sleepless Resolve
आतुरस्य कुतो निद्रा नरस्यामर्षितस्य च । अर्थाश्विन्तयतश्चापि कामयानस्य वा पुनः । तदिदं समनुप्राप्तं पश्य मेउद्य चतुष्टयम्,“मामाजी! जो मनुष्य शोकसे आतुर हो, अमर्षसे भरा हुआ हो, नाना प्रकारके कार्योंकी चिन्ता कर रहा हो अथवा किसी कामनामें आसक्त हो, उसे नींद कैसे आ सकती है? देखिये, ये चारों बातें आज मेरे ऊपर एक साथ आ पड़ी हैं
āturasya kuto nidrā narasyāmarṣitasya ca | arthāś cintayataś cāpi kāmayānasya vā punaḥ | tad idaṃ samanuprāptaṃ paśya me 'dya catuṣṭayam ||
«ທ່ານລຸງ! ຄົນທີ່ຖືກທຸກທ້ອນໂດຍຄວາມໂສກ, ຫຼືໄໝ້ຜານດ້ວຍຄວາມຄັບແຄ້ນ, ຫຼືຫມົກມຸ່ນຄິດເຖິງວຽກດ່ວນຫຼາຍຢ່າງ, ຫຼືຖືກຄວາມປາຖະໜາຄອບງໍາ—ຈະມີນອນຫຼັບໄດ້ແນວໃດ? ເບິ່ງເຖີດ—ມື້ນີ້ ທັງສີ່ຢ່າງນີ້ມາຮອດຂ້ອຍພ້ອມກັນ»។
कृप उवाच