सभा पर्व, अध्याय ३७ — युधिष्ठिरस्य भीष्मोपदेशः
Yudhiṣṭhira’s Consultation and Bhīṣma’s Counsel in the Assembly
आचार्य मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन । द्रोणे तिष्ठति वाष्णेयं कस्मादर्चितवानसि,अथवा यह मान लिया जाय कि वासुदेव कृष्ण तुमलोगोंका प्रिय चाहनेवाला और तुम्हारा अनुसरण करनेवाला सुहृद् है, इसीलिये तुमने इसकी पूजा की है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि तुम्हारे सबसे बड़े सुहृद् तो राजा ट्रुपद हैं। उनके रहते यह माधव पूजा पानेका अधिकारी कैसे हो सकता है। कुरुनन्दन! अथवा यह समझ लें कि तुम कृष्णको आचार्य मानते हो, फिर भी आचार्योमें भी बड़े-बूढ़े द्रोणाचार्यके रहते हुए इस यदुवंशीकी पूजा तुमने क्यों की है?
ācārya manyase kṛṣṇam atha vā kurunandana | droṇe tiṣṭhati vāṣṇeyaṃ kasmād arcitavān asi ||
ຊິຊຸປາລາເວົ້າວ່າ: «ໂອ ກຸຣຸນັນດະນະ! ເຈົ້າເຫັນກຣິດສະນະເປັນອາຈານຫຼື? ຫຼືຖ້າເຈົ້າອ້າງວ່າຄວນໃຫ້ກຽດແກ່ລາວ ໃນຂະນະທີ່ ໂດຣນາຈານ ຍັງຢືນຢູ່ໃນຫມູ່ອາຈານ—ເປັນຫຍັງເຈົ້າຈຶ່ງບູຊາວາສເນຍນີ້? ການຍົກກຽດກຣິດສະນະໃນສະພາຫຼວງນີ້ ເຈົ້າໄດ້ລະເລີຍລຳດັບກ່ອນຫຼັງທີ່ຕັ້ງໄວ້—ເປັນການຂັດຕໍ່ຈັນຍາທຳທີ່ຄວນເຄົາລົບຜູ້ເຖົ້າແລະຄູບາອາຈານກ່ອນ»។
शिशुपाल उवाच