वैशम्पायन उवाच निवृत्य धर्मराजस्तु सह भ्रातृभिरच्युत: । सुहृत्परिवृतो राजा प्रविवेश पुरोत्तमम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अपनी मर्यादासे च्युत न होनेवाले धर्मराज युधिष्ठिर भाइयों-सहित मार्गसे लौटकर सुहृदोंके साथ अपने श्रेष्ठ नगरके भीतर प्रविष्ट हुए
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ທັມມະຣາຊະ ຢຸທິສະຖິຣະ—ກະສັດຜູ້ບໍ່ເຄີຍຫຼຸດຈາກທຳ—ໄດ້ຫັນກັບມາພ້ອມພີ່ນ້ອງ ແລະມິດສະຫາຍ ແລ້ວເຂົ້າສູ່ນະຄອນອັນປະເສີດຂອງຕົນ.
वैशम्पायन उवाच