कृष्णेन अर्जुनस्य प्रोत्साहनम् — Kṛṣṇa’s Exhortation to Arjuna
Prelude to Karṇa’s Slaying
वेगांश्वान्ये रणे चक्र: पञ्चास्या इव पन्नगा:,प्रजानाथ! सर्पोके शरीरोंके समान प्रतीत होनेवाली कितनी ही चन्दनचर्चित भुजाएँ रणभूमिमें पाँच मुँहवाले सर्पोके समान महान् वेग प्रकट करतीं तथा रक्तरंजित होनेके कारण सुवर्णमयी ध्वजाओंके समान अधिकाधिक शोभा पाती थीं
ໂອ ຈອມເຈົ້າແຫ່ງປະຊາ, ໃນສະໜາມຮົບ ມີແຂນຫຼາຍຂ້າງທີ່ທາດ້ວຍຈັນທະນາ ແລະຄ້າຍກັບລ່າງງູ; ມັນພຸ່ງໄປດ້ວຍຄວາມໄວອັນຫນັກໜ່ວງ ດັ່ງງູຫ້າຫົວ. ເມື່ອຖືກເລືອດຍ້ອມແດງ ກໍຍິ່ງສະຫວ່າງງາມ ດັ່ງທຸງທອງຄຳ.
संजय उवाच