Droṇa–Arjuna Yuddha; Trigarta-Āvaraṇa; Bhīmasena Gajānīka-bheda
Droṇa and Arjuna Engage; Trigarta Containment; Bhīma Breaks the Elephant Corps
शृणु राजन् मम वचो यत् त्वां वक्ष्यामि कौरव । यथा त्वया महाराज वर्तितव्यं परंतप,कथयामास दुर्धर्षो विनि:श्वस्य पुनः पुनः । संजय कहते हैं--महाराज! शत्रुओंको संताप देनेवाला राजा दुर्योधन उस महान् युद्धमें एक राक्षसके द्वारा प्राप्त हुई अपनी पराजयको नहीं सह सका। उसने गंगानन्दन भीष्मजीके पास जाकर उन्हें विनीतभावसे प्रणाम करनेके पश्चात् सारा वृत्तान्त यथावत् रूपसे कह सुनाया। उस दुर्धर्ष वीरने बारंबार लम्बी साँस खींचकर घटोत्कचकी विजय और अपनी पराजयकी कथा कही “राजन! कुरुनन्दन! मैं तुमसे जो कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो। शत्रुओंको संताप देनेवाले महाराज! तुम्हें जिस प्रकार बर्ताव करना चाहिये, वह सुनो
śṛṇu rājan mama vaco yat tvāṃ vakṣyāmi kaurava | yathā tvayā mahārāja vartitavyaṃ paraṃtapa, kathayāmāsa durdharṣo viniḥśvasya punaḥ punaḥ |
ສັນຊະຍະກ່າວວ່າ: «ຂໍໃຫ້ຟັງຖ້ອຍຄໍາຂອງຂ້າ ໂອ ພະຣາຊາ, ໂອ ກົວຣະວະ—ສິ່ງທີ່ຂ້າຈະກ່າວ. ໂອ ມະຫາຣາຊາ ຜູ້ເຜົາຜານສັດຕູ, ຈົ່ງຟັງວ່າເຈົ້າຄວນປະພຶດຕົນແນວໃດ.»
संजय उवाच