भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
खेती<, गोपालन” और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार*--ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णोकी सेवा करना* शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है ।। सम्बन्ध-- इस प्रकार चारों वर्णोके स्वाभाविक कर्मोका वर्णन करके अब भक्तियुक्त कर्मयोगका स्वरूप और फल बतलानेके लिये, उन कर्मोका किस प्रकार आचरण करनेसे मनुष्य अनायास परम सिद्धिको प्राप्त कर लेता है--यह बात दो शलोकोंमें बतलाते हैं-- स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर: । स्वकर्मनिरत: सिद्धि यथा विन्दति तच्छुणु,अपने-अपने स्वाभाविक कर्मोमें तत्परतासे लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त हो जाता है?। अपने स्वाभाविक कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकारसे कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधिको तू सुन
sve sve karmaṇy abhirataḥ saṁsiddhiṁ labhate naraḥ | svakarmanirataḥ siddhiṁ yathā vindati tac chṛṇu ||
ອາຣະຈຸນກ່າວວ່າ: ຜູ້ໃດທີ່ອຸທິດໃຈຢູ່ໃນໜ້າທີ່ຂອງຕົນ ຍ່ອມໄດ້ຮັບຄວາມສົມບູນພ້ອມ. ຈົ່ງຟັງຈາກຂ້ອຍວ່າ ຜູ້ທີ່ຍືນຫມັ້ນໃນວຽກຂອງຕົນ ຈະກະທຳແນວໃດຈຶ່ງບັນລຸຄວາມສົມບູນນັ້ນ—ຄືການບັນລຸສູງສຸດທີ່ສິ້ນສຸດດ້ວຍການຮູ້ແຈ້ງພຣະເຈົ້າ—ໂດຍບໍ່ລະທິ້ງພາລະຫນ້າທີ່ຕາມສະຖານະຂອງຕົນ.
अजुन उवाच