भीष्मविक्रमदर्शनं तथा क्रौञ्चारुणव्यूहविधानम् | Bhīṣma’s Ascendancy and the Organization of the Krauñcāruṇa Formation
भीष्मपर्वणि तु एकचत्वारिंशो5 ध्याय:,भीष्मपर्वमें इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ सम्बन्ध--इस अध्यायके चौथेसे बारहवें *लोकतक भगवान्ने अपने मतके अनुसार त्याग और त्यागीके लक्षण बतलाये। तदनन्तर तेरहवेंसे सत्रहवें *लोकतक संन्यास (सांख्य)-के स्वरूपका निरूपण करके संन्यासमें सहायक सत्त्वगुणका ग्रहण और उसके विरोधी रज एवं तमका त्याग करानेके उद्देश्यसे अठारहवेंसे चालीसवें श*्लोकतक गुणोंके अनुसार ज्ञान, कर्म और कर्ता आदि मुख्य-मुख्य पदार्थोके भेद समझाये और अन्त्में समस्त युष्टिको गुणोंसे युक्त बतलाकर उस विषयका उपसंदार किया। वहाँ त्यागका स्वरूप बतलाते समय भगवान्ने यह बात कही थी कि नियत कर्मका स्वरूपसे त्याग उचित नहीं है (गीता १८/७), अपितु नियत कर्मोको आसक्ति और फलके त्यागपूर्वक करते रहना ही वास्तविक त्याग है (गीता १८॥९), किंतु वहाँ यह बात नहीं बतलायी कि किसके लिये कौन-या कर्म नियत है। अतएव अब संक्षेपर्में नियत कर्मोका स्वरूप, त्यायके नामसे वर्णित कर्मयोगमें भक्तिका सहयोग और उसका फल परम सिद्धिकी प्राप्ति बतलानेके लिये पुनः उसी त्यायरूप कर्मयोयका प्रकरण आरम्भ करते हैं ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै: हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंके तथा शूद्रोंके+ कर्म स्वभावसे उत्पन्न गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं:
brāhmaṇa-kṣatriya-viśāṁ śūdrāṇāṁ ca parantapa | karmāṇi pravibhaktāni svabhāva-prabhavair guṇaiḥ ||
ພຣະຜູ້ເປັນເຈົ້າຊີ້ແຈງວ່າ ໜ້າທີ່ໃນສັງຄົມບໍ່ແມ່ນການກຳນົດແບບສຸ່ມໆ ແຕ່ເກີດຈາກນິໄສແລະສະພາບທຳມະຊາດພາຍໃນ. ພຣະອົງຕັດກັບອາຣະຈຸນວ່າ: «ໂອ ຜູ້ເຜົາຜານສັດຕູ! ວຽກຂອງພຣາຫມັນ, ກະສັດຕຣິຍະ, ໄວຊະ, ແລະ ຊູດຣະ ໄດ້ຖືກແບ່ງສັນຕາມຄຸນທີ່ເກີດຈາກສະພາບຂອງຕົນ». ໃນແງ່ຈັນຍາບັນ ຂໍ້ນີ້ວາງກອບໃຫ້ເຫັນວ່າ ທຳມະ (dharma) ແມ່ນຄວາມຮັບຜິດຊອບທີ່ສອດຄ່ອງກັບອຸປະນິໄສ ແລະອາລົມນິໄສ; ແລະປູທາງໄປສູ່ການສອນວ່າ ການສະຫຼະທີ່ແທ້ບໍ່ແມ່ນການລະທິ້ມວຽກທີ່ຄວນເຮັດ ແຕ່ເຮັດມັນໂດຍບໍ່ຍຶດຕິດ ແລະດ້ວຍຄວາມພັກດີ.
अजुन उवाच