अक्षरब्रह्मयोग (Akṣara-Brahma-Yoga) — Knowledge of the Imperishable, Prakṛti, and Devotion
सम्बन्ध-- यथार्थ ज्ञानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है, यह बात संक्षेपयें कहकर अब छब्बीसवें श्लोकतक ज्ञानयोगद्वारा परमात्माको प्राप्त होनेके याधन तथा परमात्माको प्राप्त सिद्ध पुरुषोंके लक्षण, आचरण, महत्त्व और स्थितिका वर्णन करनेके उद्देश्यसे पहले यहाँ ज्ञानयोगके एकान्त साधनद्वारा परमात्माकी प्राप्ति बतलाते हैं-- तदबुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: । गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा:,जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रप हो रही हैः और सच्चिदानन्दघन परमात्मामें ही जिनकी निरन्तर एकीभावसे स्थिति है,* ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञानके द्वारा पापरहित* होकर अपुनरावृत्तिको अर्थात् परम गतिको प्राप्त होते हैं+
ຜູ້ທີ່ປັນຍາມຸ່ງໄປຫາພຣະອົງ ຈິດໃຈເປັນອັນດຽວກັບພຣະອົງ ຕັ້ງມັ່ນໃນພຣະອົງ ແລະຖືພຣະອົງເປັນທີ່ພຶ່ງສູງສຸດ—ເມື່ອຄວາມມົນທິນຖືກຊໍາລະດ້ວຍປັນຍາ—ຍ່ອມໄປສູ່ພາວະທີ່ບໍ່ຫວນກັບ ຄືຄວາມເຖິງຈຸດໝາຍສູງສຸດ.
अर्जुन उवाच