Marutta’s Sacrifice and Agni’s Embassy (मरुत्त-यज्ञे दूतत्वम्)
अग्निर्वाच यत्र शर्यातिं च्यवनो याजयिष्यन् सहाश्रिभ्यां सोममगृह्नादेक: । त॑ त्वं क्रुद्धः प्रत्यषेधी: पुरस्ता- च्छर्यातियज्ञं समर त॑ महेन्द्र,अग्निदेवने कहा--महेन्द्र! राजा शर्यातिके उस यज्ञका तो स्मरण कीजिये, जहाँ महर्षि च्यवन उनका यज्ञ करानेवाले थे। आप क्रोधमें भरकर उन्हें मना करते ही रह गये और उन्होंने अकेले अपने ही प्रभावसे सम्पूर्ण देवताओंसहित अश्विनीकुमारोंके साथ सोमरसका पान किया
agnir uvāca yatra śaryātiṁ cyavano yājayiṣyan sahāśribhyāṁ somam agṛhnād ekaḥ | taṁ tvaṁ kruddhaḥ praty-aṣedhīḥ purastāc charyāti-yajñaṁ smara taṁ mahendra ||
ອັກນິ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ມະເຫນທຣະ, ຈົ່ງລະລຶກເຖິງພິທີຍັດຂອງກະສັດ ຊາຣະຍາຕິ ທີ່ພຣະລິສີ ຈະຍະວະນະ ເປັນຜູ້ປະກອບພິທີ. ເຈົ້າໂກດກຽດ ແລະພະຍາຍາມຫ້າມໄວ້ກ່ອນ, ແຕ່ທ່ານນັ້ນແຕ່ຜູ້ດຽວ ດ້ວຍອຳນາດຕະບະຂອງຕົນ ໄດ້ເອົາໂສມະມາໄດ້ ແລະເຮັດໃຫ້ດື່ມ ໂດຍນັບຮວມຄູ່ອັສວິນເຂົ້າໃນຫມູ່ເທວະດ້ວຍ»។
शक्र उवाच