बभ्रुवाहन-धनंजययोः संग्रामः
Babhruvāhana and Dhanaṃjaya’s engagement at Maṇipūra
त्वामागतं च संश्रुत्य युद्धाय हयसारिणम् । पितुश्न मृत्युदुःखातोंडजहात् प्राणान् धनंजय,“निष्पाप अर्जुन! मेरे पुत्र सुरथने पहलेसे सुन रखा था कि अर्जुनके हाथसे ही मेरे पिताकी मृत्यु हुई है। इसके बाद जब उसके कानोंमें यह समाचार पड़ा है कि तुम घोड़ेके पीछे-पीछे युद्धके लिये यहाँतक आ पहुँचे हो तो वह पिताकी मृत्युके दुःखसे आतुर हो अपने प्राणोंका परित्याग कर बैठा है
tvām āgataṃ ca saṃśrutya yuddhāya hayasāriṇam | pituś ca mṛtyu-duḥkhārto jahāt prāṇān dhanaṃjaya ||
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ເມື່ອລາວໄດ້ຍິນວ່າ ເຈົ້າໄດ້ມາຮອດ—ຂີ່ຕາມຫຼັງມ້າອັດສະວະເມດະ ແລະມາທີ່ນີ້ເພື່ອຮົບ—ລາວຜູ້ຖືກຄວາມໂສກເສົ້າຈາກການຕາຍຂອງພໍ່ກົດທັບ ໄດ້ລະທິ້ງຊີວິດຂອງຕົນ, ໂອ ທະນັນຊະຍະ. ຂ່າວການເຂົ້າມາຂອງເຈົ້າໄດ້ປຸກບາດແຜເກົ່າແຫ່ງຄວາມສູນເສຍ ແລະຄວາມສິ້ນຫວັງກໍໄດ້ຄອບງຳລາວ».
वैशम्पायन उवाच