Parīkṣit-janma-saṃkaṭa and Kuntī’s petition to Vāsudeva (परिक्षिज्जन्मसंकटं कुन्त्याः प्रार्थना च)
आज्येन तर्पयित्वाग्निं विधिवत् संस्कृतेन च । मन्त्रसिद्धं चरुं कृत्वा पुरोधा: स ययौ तदा,तत्पश्चात् उनके पुरोहितने विधिपूर्वक संस्कार किये हुए घृतके द्वारा अग्निदेवको तृप्त करके मन्त्रसिद्ध चरु तैयार किया और भेंट अर्पित करनेके लिये वे देवताके समीप गये
ຕໍ່ມາ ພຣະປຸໂຣຫິດໄດ້ທຳພິທີຕາມຄວາມຖືກຕ້ອງ ໃຊ້ນ້ຳມັນເນີຍບໍລິສຸດເພື່ອບຳລຸງພຣະອັກນິເທວະ ແລະຈັດເຮັດຈາຣຸ (ອາຫານບູຊາ) ທີ່ສຳເລັດດ້ວຍມົນຕຣາ; ແລ້ວຈຶ່ງເຂົ້າໄປໃກ້ເທວະເພື່ອຖວາຍບູຊາ.
वैशम्पायन उवाच