Adhyāya 16 — Daiva, Kṣatriya-dharma, and Public Reassurance to Dhṛtarāṣṭra
युष्मत्तेजोविवृद्धयर्थ मया हाद्धर्षणं कृतम् । तदानीं विदुलावाक्यैरिति तद् वित्त पुत्रका:,राजाओ! जिसकी बुद्धि मारी गयी थी, उस पापी दुःशासनने जब मेरी इस बहूका केश पकड़कर खींचा था, तभी मैं दुःखसे मोहित हो गयी थी। यही कारण था कि उस समय विदुलाके वचनोंद्वारा मैंने तुम्हारे तेजकी वृद्धिके लिये उत्साहवर्धन किया था। पुत्रो! इस बातको अच्छी तरह समझ लो
yuṣmat-tejo-vivṛddhy-arthaṁ mayā hāddharṣaṇaṁ kṛtam | tadānīṁ vidulā-vākyair iti tad vitta putrakāḥ ||
ໄວສັມປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: ເພື່ອໃຫ້ອຳນາດກ້າຫານ ແລະ ສະຫງ່າລາສີກະສັດຂອງພວກເຈົ້າເພີ່ມພູນ, ຂ້າພະເຈົ້າຈົ່ງໃຈເວົ້າເພື່ອກະຕຸ້ນໃຫ້ພວກເຈົ້າລຸກຂຶ້ນ. ຈົ່ງເຂົ້າໃຈເຖິງ, ລູກໆຂອງຂ້າພະເຈົ້າ: ໃນເວລານັ້ນ ຂ້າພະເຈົ້າໄດ້ປຸກໃຈພວກເຈົ້າດ້ວຍຖ້ອຍຄຳຂອງ ວິດຸລາ ເພື່ອໃຫ້ຈິດໃຈກ້າຫານສູງຂຶ້ນ ແລະ ກະທຳດ້ວຍຄວາມໝັ້ນຄົງ.
वैशम्पायन उवाच