Vāraṇāvata-prasaṃsā and the Pāṇḍavas’ Departure (वरणावत-प्रशंसा तथा पाण्डव-प्रयाणम्)
नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्व किमिष्यते । अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्,द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ पहले जो मेरी मित्रता थी, वह (साथ-साथ खेलने और अध्ययन करने आदि) स्वार्थको लेकर हुई थी। सच्ची बात यह है कि दरिद्र मनुष्य धनवान्का, मूर्ख विद्वान्कां और कायर शूरवीरका सखा नहीं हो सकता; अतः पहलेकी मित्रताका क्या भरोसा करते हो? मन्दमते! बड़े-बड़े राजाओंकी तुम्हारे-जैसे श्रीहीन और निर्धन मनुष्योंके साथ कभी मित्रता हो सकती है? जो श्रोत्रिय नहीं है, वह श्रोत्रियका; जो रथी नहीं है, वह रथीका तथा जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता। फिर तुम मुझे जीर्ण-शीर्ण मित्रताका स्मरण क्यों दिलाते हो? मैंने अपने राज्यके लिये तुमसे कोई प्रतिज्ञा की थी, इसका मुझे कुछ भी स्मरण नहीं है
vaiśampāyana uvāca |
na rājā pārthivasyāpi sakhi-pūrvaṁ kim iṣyate |
ahaṁ tvayā na jānāmi rājya-arthe saṁvidaṁ kṛtām, dvija-śreṣṭha ||
ໄວສຳປາຍະນະ ກ່າວວ່າ: «ແມ່ນແຕ່ກະສັດກໍຕາມ, ມິດພາບເກົ່າກັບຜູ້ປົກຄອງແຜ່ນດິນທົ່ວໄປຈະມີຄ່າອັນໃດ? ຂ້ອຍບໍ່ຮູ້ວ່າເຄີຍມີຂໍ້ຕົກລົງໃດກັບເຈົ້າເພື່ອເລື່ອງອານາຈັກ, ໂອ ຜູ້ປະເສີດໃນຜູ້ເກີດສອງຄັ້ງ. ຢ່າໄວ້ໃຈມິດພາບທີ່ຊຳຮຸດ: ຄົນຈົນບໍ່ອາດເປັນມິດແທ້ຂອງຄົນຮັ່ງມີ, ຄົນໂງ່ບໍ່ອາດເປັນມິດຂອງຄົນມີວິຊາ, ຄົນຂີ້ຂວັນບໍ່ອາດເປັນມິດຂອງວີລະບຸລຸດ. ກະສັດໃຫຍ່ໆຈະມີມິດພາບແທ້ກັບຄົນເຊັ່ນເຈົ້າ—ຜູ້ຂາດສິຣິ ແລະຂາດທຶນຊັບ—ໄດ້ແນວໃດ? ຜູ້ບໍ່ແມ່ນ śrotriya ບໍ່ອາດເປັນມິດຂອງ śrotriya; ຜູ້ບໍ່ແມ່ນ rathin ບໍ່ອາດເປັນມິດຂອງ rathin; ແລະຜູ້ບໍ່ແມ່ນກະສັດ ບໍ່ອາດເປັນມິດຂອງກະສັດ. ເຫດໃດຈຶ່ງເຕືອນຂ້ອຍເຖິງມິດພາບທີ່ເກົ່າແກ່ຂາດຮຸ່ງ? ຂ້ອຍບໍ່ຈື່ວ່າເຄີຍສັນຍາອັນໃດກັບເຈົ້າເພື່ອອານາຈັກຂອງຂ້ອຍ»
वैशम्पायन उवाच