Adhyāya 61: Saṃmohana-astra and the Kuru Withdrawal (संमोहनास्त्रं तथा कुरुनिवृत्तिः)
सुवर्णपृष्ठं गाण्डीवं द्रक्ष्यन्ति कुरवो मम । दक्षिणेनाथ वामेन कतरेण स्विदस्यति,“आज मुझे विचित्र दिव्यास्त्रोंका प्रहार करते देखो। जैसे आकाशमें मेघोंकी घटासे बिजली प्रकट होती है, उसी प्रकार (बाणोंकी विद्युच्छटा प्रकट करनेवाले) मेरे गाण्डीव धनुषको, जिसके पृष्ठभागमें सोना मढ़ा है, आज कौरवलोग विस्मित होकर देखेंगे। आज सारी शत्रुमण्डली इकट्ठी होकर यह अनुमान लगायेगी कि अर्जुन किस हाथसे बाण चलाते हैं? दाहिने हाथसे या बायेंसे? आज मैं परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली (शत्रुसेनारूप) दुर्लड्घ्य नदीको मथ डालूँगा, जिसमें रक्त ही जल है, रथ भँवर हैं और हाथी ग्राहके स्थानमें हैं
suvarṇapṛṣṭhaṃ gāṇḍīvaṃ drakṣyanti kuravo mama | dakṣiṇenātha vāmena katareṇa svid asyati ||
ಕೌರವರು ನನ್ನ ಸುವರ್ಣಪೃಷ್ಠ ಗಾಂಡೀವವನ್ನು ನೋಡುವರು; ಆಶ್ಚರ್ಯದಿಂದ—‘ಇವನು ಬಲಗೈಯಿಂದ ಬಾಣ ಬಿಡುತ್ತಾನೋ, ಎಡಗೈಯಿಂದೋ?’ ಎಂದು ಯೋಚಿಸುವರು.
वैशम्पायन उवाच