युधिष्ठिरस्य अर्जुनप्रेषण-युक्तिवर्णनम् | Yudhiṣṭhira’s Rationale for Sending Arjuna and Request to Dhaumya
तदक्षय्यमिति प्राहु#ऋषय: संशितव्रता: । पुरुषश्रेष्ठी इसके बाद नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए तीर्थयात्रीको कन्यासंवेद्य नामक तीर्थमें जाना चाहिये। इससे वह प्रजापति मनुके लोक प्राप्त कर लेता है। भरतनन्दन! जो लोग कन्यासंवेद्यतीर्थमें थोड़ा-सा भी दान देते हैं, उनके उस दानको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि अक्षय बताते हैं ।। निश्चवीरां च समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम्,तदनन्तर त्रिलोकविख्यात निश्चीरा नदीकी यात्रा करे। इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और तीर्थयात्री पुरुष भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। नरश्रेष्ठ जो मानव निश्वीरासंगममें दान देते हैं, वे रोग-शोकसे रहित इन्द्रलोकमें जाते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात वसिष्ठ-आश्रम है
tad akṣayyam iti prāhur ṛṣayaḥ saṁśitavratāḥ |
ದೃಢವ್ರತಿಗಳಾದ ಋಷಿಗಳು ಹೇಳಿದರು—“ಭಾರತನೇ, ಅದು ಅಕ್ಷಯವೆಂದು ಹೇಳುತ್ತಾರೆ; ಕನ್ಯಾಸಂವೇದ್ಯ ತೀರ್ಥದಲ್ಲಿ ನೀಡಿದ ಅಲ್ಪ ದಾನವೂ ನಾಶವಾಗದು.”
घुलस्त्य उवाच