कुन्तीगर्भगोपनम् तथा मञ्जूषाप्रवाहः
Kuntī’s concealed childbirth and the river-borne casket
स्यन्दनेन जहि क्षिप्रं रावणं मा चिरं कृथा: । मातलि बोला--पुरुषसिंह श्रीराम! यह हरे रंगके घोड़ोंसे जुता हुआ विजयशाली उत्तम रथ देवराज इन्द्रका है। इस विशाल रथके द्वारा इन्द्रने सैकड़ों दैत्यों और दानवोंका समरांगणमें संहार किया है। नरश्रेष्ठ! मेरे द्वारा संचालित इस रथपर बैठकर आप युद्धमें रावणको शीघ्र मार डालिये, विलम्ब न कीजिये ।। १३-१४ $ ।। इत्युक्तो राघवस्तथ्यं वचो5शड्कत मातले:,मातलिके ऐसा कहनेपर श्रीरामचन्द्रजीने उसकी बातपर इसलिये संदेह किया कि कहीं यह भी राक्षसकी माया ही न हो। तब विभीषणने उनसे कहा--'पुरुषसिंह! यह दुरात्मा रावणकी माया नहीं है
syandanena jahi kṣipraṁ rāvaṇaṁ mā ciraṁ kṛthāḥ |
ಮಾರ್ಕಂಡೇಯನು ಹೇಳಿದನು—“ಈ ರಥವನ್ನು ಏರಿ ರಾವಣನನ್ನು ಶೀಘ್ರವಾಗಿ ಸಂಹರಿಸು; ವಿಳಂಬ ಮಾಡಬೇಡ।”
मार्कण्डेय उवाच