रावण–मारीचसंवादः तथा मृगप्रलोभनपूर्वकं सीताहरणोपक्रमः
Rāvaṇa–Mārīca Dialogue and the Decoy-Deer Prelude to Sītā’s Abduction
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका ६ “लोक मिलाकर कुल ३६३ “लोक हैं) ७ “5 (9) #...# >25...# ३. कुछ विद्वानोंके मतसे यह सोलह सेरका होता है। २. 'उज्छ: कणश आदानं कणिशाद्यर्जन॑ शिलम्।” इस कोषवाक्यके अनुसार बाजार उठ जानेपर या खेत कटनेपर वहाँ बिखरे हुए अन्नके दाने बीनना “उज्छ'” कहलाता है और खेत कट जानेपर वहाँ गिरी हुई गेहूँ-धान आदिकी बालें बीनना 'शील' कहा गया है। एकषष्टर्याधेकद्विशततमो< ध्याय: देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण-दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिषछ्तटिरको समझाकर अपने आश्रमको लौट जाना देवदूत उवाच महर्षे आर्यबुद्धिस्त्वं यः स्वर्गसुखमुत्तमम् । सम्प्राप्तं बहु मनन््तव्यं विमृशस्यबुधो यथा,देवदूत बोला--महर्षे! तुम्हारी बुद्धि बड़ी उत्तम है। जिस उत्तम स्वर्गीय सुखको दूसरे लोग बहुत बड़ी चीज समझते हैं, वह तुम्हें प्राप्त ही है, फिर भी तुम अनजान-से बनकर इसके सम्बन्धमें विचार करते हो--इसके गुण-दोषकी समीक्षा कर रहे हो
devadūta uvāca | maharṣe āryabuddhis tvaṁ yaḥ svargasukham uttamam | samprāptaṁ bahu mantavyaṁ vimṛśasy budho yathā ||
ದೇವದೂತನು ಹೇಳಿದನು—“ಮಹರ್ಷೇ! ನಿಮ್ಮ ಬುದ್ಧಿ ನಿಜಕ್ಕೂ ಆರ್ಯವೂ ಶ್ರೇಷ್ಠವೂ ಆಗಿದೆ. ಇತರರು ಮಹಾ ಬಹುಮಾನವೆಂದು ಭಾವಿಸುವ ಆ ಪರಮ ಸ್ವರ್ಗಸುಖವು ನಿಮಗೆ ಈಗಾಗಲೇ ಲಭಿಸಿದೆ; ಆದರೂ ನೀವು ಅಜ್ಞಾತನಂತೆ, ಜ್ಞಾನಿಯಂತೆ ಅದರ ಗುಣದೋಷಗಳನ್ನು ತೂಗಿ ವಿಚಾರಿಸುತ್ತಿದ್ದೀರಿ.”
देवदूत उवाच
Even the ‘best’ heavenly pleasure should be examined with discernment; a wise person evaluates the merits and defects of promised rewards rather than accepting them uncritically.
A divine messenger addresses the sage (Mudgala in this section), remarking that he has already attained the supreme heavenly happiness that others prize, yet he continues to reflect on it thoughtfully, assessing its pros and cons.