Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
तत्रास्य स्वकृतं कर्म छायेवानुगतं सदा । फलत्यथ सुखाहें वा दुःखाहों वाथ जायते,वहाँ दूसरे स्थूल शरीरमें उसके पूर्वजन्मका किया हुआ कर्म छायाकी भाँति सदा उसके पीछे लगा रहता और यथासमय अपना फल देता है। इसलिये जीव सुख अथवा दुःख भोगनेके योग्य होकर जन्म लेता है। यमराजके विधान (पुण्य और पापके फल-भोग)-में नियुक्त हुआ जीव अपने शुभ अथवा अशुभ लक्षणोंद्वारा अपनेको मिले हुए सुख अथवा दुःखका निवारण करनेमें असमर्थ है। यह बात ज्ञान-दृष्टिवाले महात्मा पुरुषोंद्वारा देखी जाती है
tatrāsya svakṛtaṃ karma chāyevā'nugataṃ sadā | phalaty atha sukhāheṃ vā duḥkhāheṃ vātha jāyate ||
ಅಲ್ಲಿ ಹೊಸ ದೇಹಸ್ಥಿತಿಯಲ್ಲಿ ಅವನ ಸ್ವಕೃತ ಕರ್ಮವು ನೆರಳಿನಂತೆ ಸದಾ ಅನುಸರಿಸಿ, ಕಾಲ ಬಂದಾಗ ಫಲಿಸುತ್ತದೆ; ಆದ್ದರಿಂದ ಜೀವನು ಸುಖವೋ ದುಃಖವೋ ಅನುಭವಿಸಲು ಯೋಗ್ಯನಾಗಿ ಜನ್ಮ ಪಡೆಯುತ್ತಾನೆ.
मार्कण्डेय उवाच