Karma, Preta-gati, and the Continuity of Phala
Mārkaṇḍeya’s Instruction
तदैश्वर्य समासाद्य दर्पो मामगमत् तदा । सहसं हि द्विजातीनामुवाह शिबिकां मम,तब उस ऐश्वर्यको पाकर मेरा अहंकार बढ़ गया। मैंने सहस्रों ब्राह्यगोंसे अपनी पालकी ढुलवायी। तदनन्तर ऐश्वर्यके मदसे उन्मत्त हो मैंने बहुत-से ब्राह्मगोंका अपमान किया। पृथ्वीपते! इससे कुपित हुए महर्षि अगस्त्यने मुझे इस अवस्थाको पहुँचा दिया। पाण्डुनन्दन नरेश! उन्हीं महात्मा अगस्त्यकी कृपासे आजतक मेरी स्मरणशक्ति मुझे छोड़ नहीं सकी है। (मेरी स्मृति ज्यों-की-त्यों बनी हुई है)
tad aiśvaryaṃ samāsādya darpo mām agamat tadā | sahasraṃ hi dvijātīnām uvāha śibikāṃ mama ||
ಸರ್ಪನು ಹೇಳಿದನು—ಆ ಐಶ್ವರ್ಯವನ್ನು ಪಡೆದಾಗಲೇ ಅಹಂಕಾರವು ನನ್ನನ್ನು ಆವರಿಸಿತು. ನಾನು ಸಹಸ್ರ ದ್ವಿಜರಿಂದ (ಬ್ರಾಹ್ಮಣರಿಂದ) ನನ್ನ ಶಿಬಿಕೆಯನ್ನು ಹೊರುವಂತೆ ಮಾಡಿದೆ.
सर्प उवाच