Gaya’s Seven Aśvamedhas, Payoṣṇī Snāna, and the Śaryāti Sacrifice Locale
Lomaśa–Yudhiṣṭhira Dialogue
सिकता वा यथा लोके यथा वा दिवि तारका: । यथा वा वर्षतो धारा असंख्येया: सम केनचित्,महाराज! राजा गयने सातों यज्ञोंमें सदस्योंको, जो असंख्य धन प्रदान किया था, उसकी गणना उसी प्रकार नहीं हो सकती थी, जैसे इस जगत्में कोई बालूके कणों, आकाशके तारों और वर्षाकी धाराओंको नहीं गिन सकता
ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಮರಳಿನ ಕಣಗಳಂತೆ, ಆಕಾಶದಲ್ಲಿ ನಕ್ಷತ್ರಗಳಂತೆ, ಮಳೆಯ ಧಾರೆಗಳಂತೆ—ಅವು ಅಸಂಖ್ಯ; ಯಾರಿಂದಲೂ ಅವನ್ನು ಎಣಿಸಲಾಗದು.
लोगश उवाच