Kṛṣṇa at Duryodhana’s House: Refusal of Hospitality and Departure to Vidura (कृष्णस्य धार्तराष्ट्रनिवेशनगमनम्)
पाण्डवा: समबोध्यन्त बाल्यात् प्रभृति केशव । “केशव! बाल्यावस्थासे ही पाण्डव शंख और दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनिसे, मृदंगोंके मधुर नादसे तथा बाँसुरीकी सुरीली तानसे जगाये जाते थे,अन्तं धीरा निषेवन्ते मध्यं ग्राम्यसुखप्रिया: । उत्तमांश्व॒ परिक्लेशान् भोगांश्वातीव मानुषान् धीर पुरुष भोगोंकी अन्तिम स्थितिका सेवन करते हैं। ग्राम्य विषयभोगोंमें आसक्त पुरुष भोगोंकी मध्य स्थितिका ही सेवन करते हैं। वे धीर पुरुष कर्तव्यपालनके रूपमें प्राप्त बड़े-से-बड़े क्लेशोंको सहर्ष सहन करके अन्तमें मनुष्यातीत भोगोंमें रमण करते हैं। महापुरुषोंका कहना है कि अन्तिम (सुख-दुःखसे अतीत) स्थितिकी प्राप्ति ही वास्तविक सुख है तथा सुख-दुःखके बीचकी स्थिति ही दुःख है
Vaiśampāyana uvāca | pāṇḍavāḥ samabodhyanta bālyāt prabhṛti keśava | antaṃ dhīrā niṣevante madhyaṃ grāmyasukhapriyāḥ | uttamāṃś ca parikleśān bhogāṃś cātīva mānuṣān |
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—ಹೇ ಕೇಶವ! ಪಾಂಡವರು ಬಾಲ್ಯದಿಂದಲೇ ಜಾಗೃತರೂ ಸಜಾಗರೂ ಆಗುವಂತೆ ಮಾಡಲ್ಪಟ್ಟಿದ್ದಾರೆ.
वैशम्पायन उवाच