Kṛṣṇa at Duryodhana’s House: Refusal of Hospitality and Departure to Vidura (कृष्णस्य धार्तराष्ट्रनिवेशनगमनम्)
तेजसा5<दित्यसदृशो महर्षिसदृशो दमे । क्षमया पृथिवीतुल्यो महेन्द्रसमविक्रम:,“श्रीकृष्ण! जो अर्जुन दो भुजाओंसे युक्त होकर भी सदा प्राचीनकालके सहस्र भुजाधारी कार्तवीर्य अर्जुनके साथ स्पर्धा रखता है; केशव! जो एक ही वेगसे पाँच सौ बाण चलाता है, जो पाण्डव अर्जुन धर्नुर्विद्यामें राजा कार्तवीर्यके समान ही समझा जाता है, जिसका तेज सूर्यके समान है, जो इन्द्रियसंयममें महर्षियोंके, क्षमामें पृथ्वीके और पराक्रममें देवराज इन्द्रके समान है; मधुसूदन! कौरवोंका यह विशाल साम्राज्य, जो सम्पूर्ण राजाओंमें प्रख्यात एवं प्रकाशित हो रहा है, जिसे अर्जुनने ही अपने पराक्रमसे बढ़ाया है; समस्त पाण्डव जिसके बाहुबलका भरोसा रखते हैं; जो सम्पूर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ तथा सत्यपराक्रमी है, संग्राममें जिसके सम्मुख जाकर कोई जीवित नहीं लौटता है, अच्युत! जो सम्पूर्ण भूतोंको जीतनेमें समर्थ, विजयशील एवं अजेय है तथा जैसे देवताओंके आश्रय इन्द्र हैं, उसी प्रकार जो समस्त पाण्डवोंका अवलम्ब है, वह तुम्हारा भाई और मित्र अर्जुन इस समय कैसे है?
tejasā ādityasadṛśo maharṣisadṛśo dame | kṣamayā pṛthivītulyo mahendrasamavikramaḥ ||
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು— ಅವನು ತೇಜಸ್ಸಿನಲ್ಲಿ ಸೂರ್ಯನಂತೆ; ಇಂದ್ರಿಯನಿಗ್ರಹದಲ್ಲಿ ಮಹರ್ಷಿಗಳಂತೆ; ಕ್ಷಮೆಯಲ್ಲಿ ಭೂಮಿಯಂತೆ; ಪರಾಕ್ರಮದಲ್ಲಿ ಮಹೇಂದ್ರ (ಇಂದ್ರ) ಸಮಾನನು.
वैशम्पायन उवाच