गालवस्य विषादः तथा विष्णुप्रयाणम्
Gālava’s Despair and Resolve to Seek Viṣṇu
ज्ञातीनां दुःखकर्तारें बन्धूनां शोकवर्धनम् । सुहृदां क्लेशदातारं द्विषतां हर्षवर्धनम्,जनमेजयने कहा--भगवन्! दुर्योधनका अनर्थकारी कार्योंमें ही अधिक आग्रह था। पराये धनके प्रति अधिक लोभ रखनेके कारण वह मोहित हो गया था। दुर्जनोंमें ही उसका अनुराग था। उसने मरनेका ही निश्चय कर लिया था। वह कुट॒म्बीजनोंके लिये दुःख-दायक और भाई-बन्धुओंके शोकको बढ़ानेवाला था। सुहृदोंको क्लेश पहुँचाता और शत्रुओंका हर्ष बढ़ाता था। ऐसे कुमार्गपर चलनेवाले इस दुर्योधनको उसके भाई-बन्धु रोकते क्यों नहीं थे? कोई सुहृद, स्नेही अथवा पितामह भगवान् व्यास उसे सौहार्दवश मना क्यों नहीं करते थे?
jñātīnāṃ duḥkhakartāraṃ bandhūnāṃ śokavardhanam | suhṛdāṃ kleśadātāraṃ dviṣatāṃ harṣavardhanam ||
“ತನ್ನ ಬಂಧುಜನರಿಗೆ ದುಃಖಕಾರಕನಾಗಿ, ಸಂಬಂಧಿಗಳ ಶೋಕವನ್ನು ಹೆಚ್ಚಿಸುವವನಾಗಿ, ಸುಹೃದರಿಗೆ ಕ್ಲೇಶ ನೀಡುವವನಾಗಿ, ಶತ್ರುಗಳ ಹರ್ಷವನ್ನು ವೃದ್ಧಿಸುವವನಾಗಿ ಇರುವ—ಇಂತಹ ಕುಮಾರ್ಗಸ್ಥ ದುರ್ಯೋಧನನನ್ನು ಅವನ ಸಹೋದರರು ಮತ್ತು ಬಂಧುಗಳು ಏಕೆ ತಡೆಯಲಿಲ್ಲ?”
जनमेजय उवाच