अध्याय ३५१ — उञ्छवृत्ति-व्रतसिद्धेः मानुषस्य परमगतिः
Sūrya–Nāga Dialogue on the Perfected Gleaner-Ascetic
वैशम्पायन उवाच वेदार्थान् वेत्तुकामस्य धर्मिष्ठस्य तपोनिधे: । गुरोमें ज्ञाननिष्ठस्य हिमवत्पाद आसत:,वैशम्पायनजीने कहा--राजन्! मेरे धर्मिष्ठ गुरु वेदव्यास तपस्याकी निधि और ज्ञाननिष्ठ हैं। पहले वे वेदोंके अर्थका वास्तविक ज्ञान प्राप्त करनेकी इच्छासे हिमालयके एक शिखरपर रहते थे। ये महाभारत नामक इतिहासकी रचना करके तपस्या करते-करते थक गये थे। उन दिनों इन बुद्धिमान् गुरुकी सेवामें तत्पर हम पाँच शिष्य उनके साथ रहते थे। सुमन्तु, जैमिनि, दृढ़तापूर्वक उत्तम धर्मका पालन करनेवाले पैल, चौथा मैं और पाँचवें व्यासपुत्र शुकदेव थे
vaiśampāyana uvāca | vedārthān vettukāmasya dharmiṣṭhasya taponidheḥ | guro me jñānaniṣṭhasya himavatpāda āsataḥ ||
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—“ರಾಜನೇ! ನನ್ನ ಗುರು ವೇದವ್ಯಾಸನು ಪರಮ ಧರ್ಮಿಷ್ಠ, ತಪಸ್ಸಿನ ನಿಧಿ, ಜ್ಞಾನದಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರನಿಷ್ಠನಾಗಿದ್ದ. ವೇದಾರ್ಥವನ್ನು ಯಥಾರ್ಥವಾಗಿ ತಿಳಿಯಬೇಕೆಂಬ ಆಸೆಯಿಂದ ಅವನು ಹಿಮಾಲಯದ ಪಾದಪ್ರದೇಶದಲ್ಲಿ ವಾಸಿಸುತ್ತಿದ್ದ.”
वैशम्पायन उवाच