अव्यक्त–पुरुष–विवेकः (Discrimination of Avyakta/Prakṛti and Puruṣa) — Yājñavalkya’s Anvīkṣikī to Viśvāvasu
योग एष हि योगानां किमन्यद् योगलक्षणम् । एवं पश्यं प्रपश्यन्ति आत्मानमजरं परम्,सूक्ष्म बुद्धिरूप धन-सम्पन्न पुरुष ही मनोमय दीपकके द्वारा उस लोकस्रष्टा परमात्माका साक्षात्कार कर सकते हैं। वह परमात्मा महान् अन्धकारसे परे और तमोगुणसे रहित है; इसलिये वेदके पारगामी सर्वज्ञ पुरुषोंने उसे तमोनुद (अज्ञान नाशक) कहा है। वह निर्मल, अज्ञानरहित, लिंगहीन और अलिंग नामसे प्रसिद्ध (उपाधिशून्य) है। यही योगियोंका योग है। इसके सिवा योगका और क्या लक्षण हो सकता है। इस तरह साधना करनेवाले योगी सबके द्रष्टा अजर-अमर परमात्माका दर्शन करते हैं
yoga eṣa hi yogānāṁ kim anyad yogalakṣaṇam | evaṁ paśyan prapaśyanti ātmānam ajaraṁ param ||
ವಸಿಷ್ಠನು ಹೇಳಿದರು—ಇದೇ ಯೋಗಗಳಲ್ಲಿಯೂ ಯೋಗಸಾರ; ಇದಕ್ಕಿಂತ ಬೇರೆ ಯೋಗಲಕ್ಷಣವೇನು? ಹೀಗೆ ನೋಡುವ ನಿಯಮಿತ ದರ್ಶಕರು ಅಜನ್ಮ, ಅಜರ, ಪರಾತ್ಪರವಾದ ಪರಮ ಆತ್ಮನನ್ನು ದರ್ಶಿಸುತ್ತಾರೆ. ಇದು ಕೇವಲ ವಾದವಲ್ಲ; ಅಜ್ಞಾನ ನಿವೃತ್ತಿಯಾದಾಗ ಅಂತರ್ಜ್ಯೋತಿ ಪ್ರಕಾಶಿಸಿ, ನಿರ್ಮಲ ನಿರುಪಾಧಿಕ ತತ್ತ್ವವನ್ನು ಪ್ರಕಟಿಸುತ್ತದೆ.
वसिष्ठ उवाच