Vānaprastha-vṛtti and the Transition toward the Fourth Āśrama (वानप्रस्थवृत्तिः चतुर्थाश्रमोपक्रमश्च)
चेतनाबन्धुरश्वारुश्चाचारग्रहनेमिमान् । दर्शनस्पर्शनवहो प्राणभश्रवणवाहन:,यह योग एक सुन्दर रथ है। धर्म ही इसका पिछला भाग या बैठक है। लज्जा आवरण है। पूर्वोक्त तपाय और अपाय इसका कूबर है। अपानवायु धुरा है। प्राणवायु जूआ हैं। बुद्धि आयु है। जीवन बन्धन है। चैतन्य बन्धुर है। सदाचार-ग्रहण इस रथकी नेमि हैं। नेत्र, त्वचा, प्राण और श्रवण इसके वाहन हैं। प्रज्ञा नाभि है। सम्पूर्ण शास्त्र चाबुक है। ज्ञान सारथि है। क्षेत्रज्ञ (जीवात्मा) इसपर रथी बनकर बैठा हुआ है। यह रथ धीरे-धीरे चलनेवाला है। श्रद्धा और इन्द्रिययमन इस रथके आगे-आगे चलनेवाले रक्षक हैं। त्यागरूपी सूक्ष्म गुण इसके अनुगामी (पृष्ठ-रक्षक) हैं। यह मंगलमय रथ ध्यानके पवित्र मार्गपर चलता है। इस प्रकार यह जीवयुक्त दिव्य रथ ब्रह्मलोकमें विराजमान होता है। अर्थात् इसके द्वारा जीवात्मा परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है
cetanābandhur aśvārūś cācāragṛhane mimān | darśanasparśanavaho prāṇabhraśravaṇavāhanaḥ ||
ಚೈತನ್ಯವು ಅದರ ಸಂಗಾತಿ; ಸದಾಚಾರ-ಗ್ರಹಣವು ಅದರ ನೇಮಿ. ದರ್ಶನ ಮತ್ತು ಸ್ಪರ್ಶನ ಅದರ ವಹನಗಳು; ಪ್ರಾಣ ಮತ್ತು ಶ್ರವಣ ಅದರ ವಾಹನಗಳು.
व्यास उवाच