अव्यक्त-मानस-सृष्टिवादः
Doctrine of Creation from the Unmanifest ‘Mānasa’
(हृष्पन्तमवसीदन्तं सुखदुःखविपर्यये । आत्मानमनुशोचामि ममैष हृदि संस्थित: ।।) सुख और दुःखका चक्र घूमता रहता है। मैं सुखमें हर्षसे फूल उठता हूँ और दु:खमें खिन्न हो जाता हूँ। ऐसी अवस्थामें पड़े हुए अपने-आपके लिये मुझे निरन्तर शोक होता है। यह शोक मेरे हृदयमें डेरा डाले बैठा है ।। ब्राह्मण उवाच पश्य भूतानि दुःखेन व्यतिषिक्तानि सर्वशः । उत्तमाधममध्यानि तेषु तेष्विह कर्मसु,ब्राह्मणने कहा--राजन्! देखो, इस संसारमें उत्तम, मध्यम और अधम सभी प्राणी भिन्न-भिन्न कर्मोंमें आसक्त हो दुःखसे ग्रस्त हो रहे हैं
hṛṣyantam avasīdantaṃ sukhaduḥkhaviparyaye | ātmānam anuśocāmi mamaiṣa hṛdi saṃsthitaḥ ||
ಬ್ರಾಹ್ಮಣನು ಹೇಳಿದನು—ರಾಜನೇ! ನೋಡು; ಈ ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಉತ್ತಮ, ಮಧ್ಯಮ, ಅಧಮ—ಎಲ್ಲ ಜೀವಿಗಳೂ ತಮ್ಮ ತಮ್ಮ ಕರ್ಮಗಳಲ್ಲಿ ಆಸಕ್ತರಾಗಿ ಎಲ್ಲೆಡೆ ದುಃಖದಿಂದ ಮಿಶ್ರಿತರಾಗಿದ್ದಾರೆ.
ब्राह्मण उवाच