कार्त्तिकेयाभिषेकः — Consecration of Kārttikeya and the Enumeration of His Retinue
कितने ही मेघों और पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। उन्होंने अपने हाथोंमें चक्र और गदा आदि आयुध ले रखे थे। कोई अंजनपुंजके समान काले और कोई श्वेत गिरिके समान गौर कान्तिसे सुशोभित होते थे ।। सप्त मातृगणाश्वैव समाजममुर्विशाम्पते । साध्या विश्वेष्थ मरुतो वसव: पितरस्तथा
saptamātṛgaṇāś caiva samājam amurviśāmpate | sādhya viśve ca maruto vasavaḥ pitaras tathā ||
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—ಓ ನರಾಧಿಪತೇ! ಅಲ್ಲಿ ಸಪ್ತಮಾತೃಗಣಗಳೂ ಸಮಾಗಮಗೊಂಡಿದ್ದರು; ಸಾಧ್ಯರು, ವಿಶ್ವೇದೇವರು, ಮರುತ್ಗಣ, ವಸುಗಳು ಹಾಗೂ ಪಿತೃಗಳೂ ಸಹ.
वैशम्पायन उवाच