(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २९ श्लोक मिलाकर कुल ६५ श्लोक हैं) अीद-आफीाद-- बछ। एफ काया अशीतितमोब<्ध्याय: वनगमनके समय पाण्डवोंकी चेष्टा और प्रजाजनोंकी शोकातुरताके विषयमें धृतराष्ट्र तथा विदुरका संवाद और शरणागत कौरवोंको द्रोणाचार्यका आश्वासन वैशम्पायन उवाच तमागतमथो राजा विदुरं दीर्घदर्शिनम् । साशडूक इव पप्रच्छ धृतराष्ट्रोडम्बिकासुत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दूरदर्शी विदुरजीके आनेपर अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने शंकित-सा होकर पूछा
vaiśampāyana uvāca | tam āgatam atho rājā viduraṃ dīrghadarśinam | sāśaṅka iva papraccha dhṛtarāṣṭro ’mbikāsutaḥ ||
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು— ಜನಮೇಜಯ! ದೂರದರ್ಶಿ ವಿದುರನು ಬಂದಾಗ, ಅಂಬಿಕಾಸುತ ರಾಜ ಧೃತರಾಷ್ಟ್ರನು ಸಂಶಯಗ್ರಸ್ತನಾದವನಂತೆ ಅವನನ್ನು ಪ್ರಶ್ನಿಸಿದನು।
वैशम्पायन उवाच