अर्हणनिर्णयः
Decision on the Highest Honor at the Assembly
अफत-८#-रू- जा - नीलकण्ठीकी टीकामें छः: अग्नियाँ इस प्रकार बतायी गयी हैं--आरम्भणीय, क्षत्र, धृति, व्युष्टि, द्विरात्र और दशपेय। (अर्घाभिहरण पर्व) षटत्रिशो<ध्याय: राजसूययज्ञमें ब्राह्मणों तथा राजाओंका समागम, श्रीनारदजीके द्वारा श्रीकृष्ण-महिमाका वर्णन और भीष्मजीकी अनुमतिसे श्रीकृष्णकी अग्रपूजा वैशम्पायन उवाच ततो<5भिषेचनीयेडट्रि ब्राह्मणा राजभि: सह । अन्तर्वेदीं प्रविविशु: सत्काराहा महर्षय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर अभिषेचनीय- कर्मके दिन सत्कारके योग्य महर्षिगण और ब्राह्मणलोग राजाओंके साथ यज्ञभवनमें गये इस प्रकार श्रीम्याभारत सभापतव॑के अन्तर्गत अर्घाभिद्दरणपर्वमें श्रीकृष्णको अ््यदानविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३६ ॥ है ० बछ। ] अति्ऑशाड<ह ३. जिसमें पूजनीय पुरुषोंका अभिषेक--अर्घध्य देकर सम्मान किया जाता है, उस कर्मका नाम अभिषेचनीय है। यह राजसूययज्ञका अंगभूत सोमयागविशेष है। २. यह एक प्रकारका वाद है, जिसमें वादी छल, जाति और निग्रहस्थानको लेकर अपने पक्षका मण्डन और विपक्षीके पक्षका खण्डन करता है। इसमें वादीका उद्देश्य तत्त्वनिर्णय नहीं होता, किंतु स्वपक्षस्थापन और परपक्षखण्डनमात्र होता है। वादके समान इसमें भी प्रतिज्ञा, हेतु आदि पाँच अवयव होते हैं। 3. जिस बहस या वाद-विवादका उद्देश्य अपने पक्षकी स्थापना या परपक्षका खण्डन न होकर व्यर्थकी बकवादमात्र हो, उसका नाम “वितण्डा' है। सप्तत्रिशो5ध्याय: शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन शिशुपाल उवाच नायमर्हति वार्ष्णेयस्तिष्ठत्स्विह महात्मसु । महीपतिषु कौरव्य राजवत् पार्थिवार्हणम्
vaiśampāyana uvāca | tato 'bhiṣecanīye 'hani brāhmaṇā rājabhiḥ saha | antarvedīṁ praviviśuḥ satkārārhā maharṣayaḥ ||
ವೈಶಂಪಾಯನನು ಹೇಳಿದನು—ನಂತರ ಅಭಿಷೇಚನೀಯ ಕರ್ಮದ ದಿನದಲ್ಲಿ ಸತ್ಕಾರಾರ್ಹರಾದ ಮಹರ್ಷಿಗಳು ಮತ್ತು ಬ್ರಾಹ್ಮಣರು ರಾಜರೊಂದಿಗೆ ಅಂತರ್ವೇದಿಗೆ ಪ್ರವೇಶಿಸಿದರು।
वैशम्पायन उवाच
Legitimate sovereignty is framed as dharma-bound: royal authority is publicly affirmed through correct ritual procedure and through honoring those worthy of honor (seers and brāhmaṇas), showing that power is to be exercised under sacred and ethical norms.
On the consecratory day of Yudhiṣṭhira’s Rājasūya-related rites, the honored seers and brāhmaṇas, along with assembled kings, enter the inner ritual arena, setting the stage for subsequent events in the ceremony (including discussions leading toward Kṛṣṇa’s preeminent worship).