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Shloka 74

Adhyāya 31: Rājasūya-samāgama — The Gathering of Kings and the Ordering of Hospitality

(लड़कामभिमुखो राजन्‌ समुद्रमवलोकयत्‌ ।। कूर्मग्राहझषाकीर्ण नक्रैर्मीनिस्तथा55कुलम्‌ । शुक्तिव्रातैः समाकीर्ण शड्खानां निचयाकुलम्‌ ।। राजन! लंकाकी ओर जाते हुए घटोत्कचने समुद्रको देखा। वह कछुओं, मगरों, नाकों तथा मत्स्य आदि जल-जन्तुओंसे भरा हुआ था। उसमें ढेर-के-ढेर शंख और सीपियाँ छा रही थीं। स दृष्टवा रामसेतुं च चिन्तयन्‌ रामविक्रमम्‌ । प्रणम्य तमतिक्रम्य याम्यां वेलामलोकयत्‌ ।। भगवान्‌ श्रीरामके द्वारा बनवाये हुए पुलको देखकर घटोत्कचको भगवानके पराक्रमका चिन्तन हो आया और उस सेतुतीर्थकोी प्रणाम करके उसने समुद्रके दक्षिणतटकी ओर दृष्टिपात किया। गत्वा पारं समुद्रस्थ दक्षिणं स घटोत्कच: । ददर्श लड्कां राजेन्द्र नाकपृष्ठोपमां शुभाम्‌ ।। राजेन्द्र! तत्पश्चात्‌ दक्षिणतटपर पहुँचकर घटोत्कचने लंकापुरी देखी, जो स्वर्गके समान सुन्दर थी। प्राकारेणावृतां रम्यां शुभद्वारैश्वन शोभिताम्‌ । प्रासादैर्बहुसाहसैः श्वेतरक्तैश्व॒ संकुलाम्‌ ।। उसके चारों ओर चहारदीवारी बनी थी। सुन्दर फाटक उस रमणीयपुरीकी शोभा बढ़ाते थे। सफेद और लाल रंगके हजारों महलोंसे वह लंकापुरी भरी हुई थी। तापनीयगवाक्षेण मुक्ताजालान्तरेण च । हैमराजतजालेन दान्तजालैश्व शोभिताम्‌ ।। वहाँके गवाक्ष (जँगले) सोनेके बने हुए थे और उनके भीतर मोतियोंकी जाली लगी हुई थी। कितने ही गवाक्ष सोने, चाँदी तथा हाथीदाँतकी जालियोंसे सुशोभित थे। हर्म्यगोपुरसम्बाधां रुक्मतोरणसंकुलाम्‌ । दिव्यदुन्दुभिनिर्हादामुद्यानवनशोभिताम्‌ ।। कितनी ही अट्ठालिकाएँ तथा गोपुर उस नगरीकी शोभा बढ़ाते थे। स्थान-स्थानपर सोनेके फाटक लगे हुए थे। वहाँ दिव्य दुन्दुभियोंकी गम्भीर ध्वनि गूँजती रहती थी। बहुत-से उद्यान और वन उस नगरीकी श्रीवृद्धि कर रहे थे। पुष्पगन्धैश्व संकीर्णा रमणीयमहापथाम्‌ । नानारल्नैश्व सम्पूर्णामिन्द्रस्येवामरावतीम्‌ ।। उसमें चारों ओर फूलोंकी सुगन्ध छा रही थी। वहाँकी लंबी-चौड़ी सड़कें बहुत सुन्दर थीं। भाँति-भाँतिके रत्नोंसे भरी-पुरी लंका इन्द्रकी अमरावतीपुरीको भी लज्जित कर रही थी। विवेश स पुरी लड्कां राक्षसैश्व निषेविताम्‌ । ददर्श राक्षसव्राताउछूलप्राशधरान्‌ बहून्‌ ।। घटोत्कचने राक्षसोंसे सेवित उस लंकापुरीमें प्रवेश किया और देखा, झुंड-के-झुंड राक्षस त्रिशूल और भाले लिये विचर रहे हैं। नानावेषधरान्‌ दक्षान्‌ नारीश्व प्रियदर्शना: । दिव्यमाल्याम्बरधरा दिव्याभरणभूषिता: ।। वे सभी युद्धमें कुशल हैं और नाना प्रकारके वेष धारण करते हैं। घटोत्कचने वहाँकी नारियोंको भी देखा। वे सब-की-सब बड़ी सुन्दर थीं। उनके अंगोंमें दिव्य वस्त्र, दिव्य आभूषण तथा दिव्य हार शोभा दे रहे थे। मदरक्तान्तनयना: पीनश्रोणिपयोधरा: । भैमसेनिं ततो दृष्टवा हृष्टास्ते विस्मयं गता: ।। उनके नेत्रोंके किनारे मदिराके नशेसे कुछ लाल हो रहे थे। उनके नितम्ब और उरोज उभरे हुए तथा मांसल थे। भीमसेनपुत्र घटोत्कचको वहाँ आया देख लंकानिवासी राक्षसोंको बड़ा हर्ष और विस्मय हुआ। आससाद गृहं राज्ञ इन्द्रस्य सदनोपमम्‌ | स द्वारपालमासाद्य वाक्यमेतदुवाच ह ।। इधर घटोत्कच इत्रभवनके समान मनोहर राजमहलके द्वारपर जा पहुँचा और द्वारपालसे इस प्रकार बोला। घटोत्कच उवाच कुरूणामृषभो राजा पाण्डुर्नमाम महाबल: । कनीयांस्तस्य दायाद: सहदेव इति श्रुतः ।। घटोत्कचने कहा--कुरुकुलमें एक श्रेष्ठ राजा हो गये हैं। वे महाबली नरेश “पाण्डु' के नामसे विख्यात थे। उनके सबसे छोटे पुत्रका नाम “सहदेव' है। कृष्णमित्रस्य तु गुरो राजसूयार्थमुद्यत: । तेनाहं प्रेषितो दूत: करार्थ कौरवस्य च ।। वे अपने बड़े भाई युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ सम्पन्न करनेके लिये कटिबद्ध हैं। धर्मराज युधिष्ठिरके सहायक भगवान्‌ श्रीकृष्ण हैं। सहदेवने कुरुराज युधिष्ठिरके लिये कर लेनेके निमित्त मुझे दूत बनाकर यहाँ भेजा है। द्रष्टमिच्छामि पौलस्त्य॑ त्वं क्षिप्रं मां निवेदय । मैं पुलस्त्यनन्दन महाराज विभीषणसे मिलना चाहता हूँ। तुम शीघ्र जाकर उन्हें मेरे आगमनकी सूचना दो। वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा द्वारपालो महीपते । तथेत्युक्त्वा विवेशाथ भवनं स निवेदक: ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! घटोत्कचका वह वचन सुनकर वह द्वारपाल “बहुत अच्छा" कहकर सूचना देनेके लिये राजभवनके भीतर गया। साञ्जलि: स समाचष्ट सर्वा दूतगिरं तदा । द्वारपालवच: श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषण: ।। उवाच वाक्यं धर्मात्मा समीपे मे प्रवेश्यताम्‌ । वहाँ उसने हाथ जोड़कर दूतकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं। द्वारपालकी बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषणने उससे कहा--'दूतको मेरे समीप ले आओ'। एवमुक्तस्तु राजेन्द्र धर्मज्ञेन महात्मना । अथ निष्क्रम्य सम्भ्रान्तो द्वा:स्थो हैडिम्बमब्रवीत्‌ ।। राजेन्द्र! धर्मज्ञ महात्मा विभीषणकी ऐसी आज्ञा होनेपर द्वारपाल बड़ी उतावलीके साथ बाहर निकला और घटोत्कचसे बोला--। एहि दूत नृपं द्रष्ट क्षिप्रं प्रविश च स्वयम्‌ । द्वारपालवच: श्रुत्वा प्रविवेश घटोत्कच: ।। “दूत! आओ। महाराजसे मिलनेके लिये राजभवनमें शीघ्र प्रवेश करो।” द्वारपालका कथन सुनकर घटोत्कचने राजभवनमें प्रवेश किया। स प्रविश्य ददर्शाथ राक्षसेन्द्रस्य मन्दिरम्‌ । ततः कैलाससंकाशं तप्तकाञज्चनतोरणम्‌ ।। तदनन्तर उसमें प्रवेश करके उसने राक्षसराज विभीषणका महल देखा, जो अपनी उज्ज्वल आभासे कैलासके समान जान पड़ता था। उसका फाटक तपाकर शुद्ध किये हुए सोनेसे तैयार किया गया था। प्राकारेण परिक्षिप्तं गोपुरैश्चापि शोभितम्‌ । हर्म्यप्रासादसम्बाधं नानारत्नसमन्वितम्‌ ।। चहारदीवारीसे घिरा हुआ वह राजमन्दिर अनेक गोपुरोंसे सुशोभित हो रहा था। उसमें बहुत-सी अट्टालिकाएँ तथा महल बने हुए थे। भाँति-भाँतिके रत्न उस राजभवनकी शोभा बढ़ाते थे। काज्चनैस्तापनीयैश्वलू स्फाटिकै राजतैरपि । वजवैडूर्यगर्भश्न स्तम्भे्दृष्टिमनो हरै: । नानाध्वजपताकाभि: सुवर्णभिश्च चित्रितम्‌ । तपाये हुए सुवर्ण, रजत (चाँदी) तथा स्फटिकमणिके बने हुए खम्भे नेत्र और मनको बरबस अपनी ओर खींच लेते थे। उन खम्भोंमें हीरे और वैदूर्य जड़े हुए थे। सुनहरे रंगकी विविध ध्वजा-पताकाओंसे उस भव्य भवनकी विचित्र शोभा हो रही थी। चित्रमाल्यावृतं रम्यं तप्तकाज्चनवेदिकम्‌ ।। तान्‌ दृष्टवा तत्र सर्वान्‌ स भैमसेनिर्मनोरमान्‌ । प्रविशन्नेव हैडिम्ब: शुश्राव मुरजस्वनम्‌ ।। विचित्र मालाओंसे अलंकृत तथा विशुद्ध स्वर्णमय वेदिकाओंसे विभूषित वह राजभवन बड़ा रमणीय दिखायी दे रहा था। उस महलकी इन सारी मनोरम विशेषताओंको देखकर घटोत्कचने ज्यों ही भीतर प्रवेश किया, त्यों ही उसके कानोंमें मृदंगकी मधुर ध्वनि सुनायी पड़ी। तन्त्रीगीतसमाकीर्ण समतालमिताक्षरम्‌ । दिव्यदुन्दुभिनि्हादं वादित्रशतसंकुलम्‌ ।। वहाँ वीणाके तार झंकृत हो रहे थे और उसके लयपर गीत गाया जा रहा था, जिसका एक-एक अक्षर समतालके अनुसार उच्चारित हो रहा था। सैकड़ों वाद्योंके साथ दिव्य दुन्दुभियोंका मधुर घोष गूँज रहा था। स श्रुत्वा मधुरं शब्दं प्रीतिमानभवत्‌ तदा । ततो विगाह्द[ हैडिम्बो बहुकक्षां मनोरमाम्‌ ।। स ददर्श महात्मान द्वा:स्थेन भरतर्षभ । त॑ं विभीषणमासीनं काउ्चने परमासने ।। भरतश्रेष्ठ। वह मधुर शब्द सुनकर घटोत्कचके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने अनेक मनोरम कक्षाओंको पार करके द्वारपालके साथ जा सुन्दर स्वर्ण सिंहासनपर बैठे हुए महात्मा विभीषणका दर्शन किया। दिव्ये भास्करसंकाशे मुक्तामणिविभूषिते । दिव्याभरणचित्राडूं दिव्यरूपधरं विभुम्‌ ।। उनका सिंहासन सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था और उसमें मोती तथा मणि आदि रत्न जड़े हुए थे। दिव्य आभूषणोंसे राक्षसराज विभीषणके अंगोंकी विचित्र शोभा हो रही थी। उनका रूप दिव्य था। दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धोक्षितं शुभम्‌ | विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्र भम्‌ ।। वे दिव्य माला और दिव्य वस्त्र धारण करके दिव्य गन्धसे अभिषिक्त हो बड़े सुन्दर दिखायी दे रहे थे। उनकी अंगकान्ति सूर्य तथा अग्निके समान उद्धासित हो रही थी। उपोपविष्टं सचिवैददेवैरिव शतक्रतुम्‌ ।। यक्षैमहारथैर्दिव्यैर्नारीभि: प्रियदर्शनै: । गीर्भिमड्रलयुक्ताभि: पूज्यमानं यथाविधि ।। जैसे इन्द्रके पास बहुत-से देवता बैठते हैं, उसी प्रकार विभीषणके समीप उनके अनेक सचिव बैठे थे। बहुत-से दिव्य सुन्दर महारथी यक्ष अपनी स्त्रियोंके साथ मंगलयुक्त वाणीद्वारा विभीषणका विधिपूर्वक पूजन कर रहे थे। चामरे व्यजने चाग्रये हेमदण्डे महाधने । गृहीते वरनारीभ्यां धूयमाने च मूर्थनि ।। दो सुन्दरी नारियाँ सुवर्णमय दण्डसे विभूषित बहुमूल्य चँवर तथा व्यजन लेकर उनके मस्तकपर डुला रही थीं। आर्चिष्मन्तं श्रिया जुष्टं कुबेरवरुणोपमम्‌ । धर्मे चैव स्थित नित्यमद्धुतं राक्षसेश्वरम्‌ ।। राक्षलराज विभीषण कुबेर और वरुणके समान राजलक्ष्मीसे सम्पन्न एवं अद्भुत दिखायी देते थे। उनके अंगोंसे दिव्य प्रभा छिटक रही थी। वे सदा धर्ममें स्थित रहते थे। राममिक्ष्वाकुनाथं वै स्मरन्तं मनसा सदा | दृष्टवा घटोत्कचो राजन्‌ ववन्दे तं कृताञ्जलि: ।। वे मन-ही-मन इक्ष्वाकुवंशशिरोमणि श्रीरामचन्द्रजीका स्मरण करते थे। राजन! उन राक्षसराज विभीषणको देख घटोत्कचने हाथ जोड़कर उन्हें प्रणाम किया। प्रह्चस्तस्थौ महावीर्य: शक्रं चित्ररथो यथा । त॑ दूतमागतं दृष्टवा राक्षसेन्द्रो विभीषण: ।। पूजयित्वा यथान्यायं सान्त्वपूर्व वचो<ब्रवीत्‌ | और जैसे महापराक्रमी चित्ररथ इन्द्रके सामने नम्र रहते हैं, उसी प्रकार महाबली घटोत्कच भी विनीतभावसे उनके सम्मुख खड़ा हो गया। राक्षसराज विभीषणने उस दूतको आया हुआ देख उसका यथायोग्य सम्मान करके सान्त्वनापूर्ण वचनोंमें कहा। विभीषण उवाच कस्य वंशे तु संजात: करमिच्छन्‌ महीपति: ।। तस्यानुजान्‌ समस्तांश्व पुरं देशं च तस्य वै । त्वां च कार्य च तत्‌ सर्व श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।। विस्तरेण मम ब्रूहि स्वानितान्‌ पृथक्‌ू-पृथक्‌ । विभीषणने पूछा--दूत! जो महाराज मुझसे कर लेना चाहते हैं, वे किसके कुलमें उत्पन्न हुए हैं। उनके समस्त भाइयों तथा ग्राम और देशका परिचय दो। मैं तुम्हारे विषयमें भी जानना चाहता हूँ तथा तुम जिस कार्यके लिये कर लेने आये हो, उस समस्त कार्यके विषयमें भी मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ। तुम मेरी पूछी हुई इन सब बातोंको विस्तारपूर्वक पृथक्‌ू-पृथक्‌ बताओ। वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु हैडिम्ब: पौलस्त्येन महात्मना ।। कृताञ्जलिरुवाचाथ सान्त्वयन्‌ राक्षसाधिपम्‌ | वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महात्मा विभीषणके इस प्रकार पूछनेपर हिडिम्बाकुमार घटोत्कचने हाथ जोड़कर राक्षसराजको आश्वासन देते हुए कहा। घटोत्कच उवाच सोमस्य वंशे राजा55सीत्‌ पाण्डु्नाम महाबल: । पाण्डो: पुत्राश्न पज्चासछछक्रतुल्यपराक्रमा: ।। तेषां ज्येष्टस्तु नाम्नाभूद्‌ धर्मपुत्र इति श्रुतः । घटोत्कच बोला--महाराज! चन्द्रवंशमें पाण्डु नामसे प्रसिद्ध एक महाबली राजा हो गये हैं। उनके पाँच पुत्र हैं, जो इन्द्रके समान पराक्रमी हैं। उन पाँचोंमें जो बड़े हैं, वे धर्मपुत्रके नामसे विख्यात हैं। अजातशगक्रुर्धर्मात्मा धर्मो विग्रहवानिव ।। ततो युधिष्छिरो राजा प्राप्प राज्यमकारयत्‌ | गज्जाया दक्षिणे तीरे नगरे नागसाह्वये ।। उनके मनमें किसीके प्रति शत्रुता नहीं है; इसलिये लोग उन्हें अजातशत्रु कहते हैं। उनका मन सदा धर्ममें ही लगा रहता है। वे धर्मके मूर्तिमान्‌ स्वरूप जान पड़ते हैं। गंगाके दक्षिणतटपर हस्तिनापुर नामका एक नगर है। राजा युधिष्ठिर वहीं अपना पैतृक राज्य प्राप्त करके उसकी रक्षा करते थे। तद्‌ दत्त्वा धृतराष्ट्राय शक्रप्रस्थं ययौ ततः । भ्रातृभि सह राजेन्द्र शक्रप्रस्थे प्रमोदते ।। राक्षसराज! कुछ कालके पश्चात्‌ उन्होंने हस्तिनापुरका राज्य धृतराष्ट्रको सौंप दिया और स्वयं वे भाइयोंसहित इन्द्रप्रस्थ चले गये। इन दिनों वे वहीं आनन्दपूर्वक रहते हैं। गड़ायमुनयोर्म ध्ये तावुभौ नगरोत्तमौ । नित्यं धर्मे स्थितो राजा शक्रप्रस्थे प्रशासति ।। वे दोनों श्रेष्ठ नगर गंगा-यमुनाके बीचमें बसे हुए हैं। नित्य धर्मपरायण राजा युधिष्ठछिर इन्द्रप्रस्थमें ही रहकर शासन करते हैं। तस्यानुजो महाबाहुः भीमसेनो महाबल: । महातेजा महावीर्य: सिंहतुल्य: स पाण्डव: ।। उनके छोटे भाई पाण्डुकुमार महाबाहु भीमसेन भी बड़े बलवान हैं। वे सिंहके समान महापराक्रमी और अत्यन्त तेजस्वी हैं। दशनागसहस्राणां बले तुल्य: स पाण्डव: | तस्यानुजोअ<र्जुनो नाम महावीर्यपराक्रम: ।। सुकुमारो महासत्त्वो लोके वीर्येण विश्रुत: । उनमें दस हजार हाथियोंका बल है। उनसे छोटे भाईका नाम अर्जुन है, जो महान्‌ बल- पराक्रमसे सम्पन्न, सुकुमार तथा अत्यन्त थैर्यवान्‌ हैं। उनका पराक्रम विश्वमें विख्यात है। कार्तवीर्यसमो वीर्ये सागरप्रतिमो बले ।। जामदग्न्यसमो हास्त्रे संख्ये रामसमोअ<र्जुन: । रूपे शक्रसम: पार्थस्तेजसा भास्करोपम: ।। वे कुन्तीनन्दन अर्जुन कार्तवीर्य अर्जुनके समान पराक्रमी, सगरपुत्रोंके समान बलवान, परशुरामजीके समान अस्त्रविद्याके ज्ञाता, श्रीरामचन्द्रजीके समान समरविजयी, इन्द्रके समान रूपवान्‌ तथा भगवान्‌ सूर्यके समान तेजस्वी हैं। देवदानवगन्धर्व: पिशाचोरगराक्षसै: । मानुषैश्व समस्तैश्न अजेय: फाल्गुनो रणे ।। देवता, दानव, गन्धर्व, पिशाच, नाग, राक्षस और मनुष्य ये सब मिलकर भी युद्धमें अर्जुनको परास्त नहीं कर सकते। तेन तत्‌ खाण्डवं दावं तर्पितं जातवेदसे । तरसा धर्षयित्वा तं शक्रं देवगणै: सह ।। लब्धान्यस्त्राणि दिव्यानि तर्पयित्वा हुताशनम्‌ । उन्होंने खाण्डववनको जलाकर अग्निदेवको तृप्त किया है। देवताओंसहित इन्द्रको वेगपूर्वक पराजित करके उन्होंने अग्निदेवको संतुष्ट किया और उनसे दिव्यास्त्र प्राप्त किये हैं। तेन लब्धा महाराज दुर्लभा देवतैरपि । वासुदेवस्य भगिनी सुभद्रा नाम विश्ुता ।। महाराज! उन्होंने भगवान्‌ श्रीकृष्णकी बहिन सुभद्राको पत्नीरूपमें प्राप्त किया है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ थी। अर्जुनस्यानुजो राजन्‌ नकुलश्रैति विश्लुत: ।। दर्शनीयतमो लोके मूर्तिमानिव मन्मथ: । राजन! अर्जुनके छोटे भाई नकुल नामसे विख्यात हैं, जो इस जगतमें मूर्तिमान्‌ कामदेवके समान दर्शनीय हैं। तस्यानुजो महातेजा: सहदेव इति श्रुतः । तेनाहं प्रेषितो राजन्‌ सहदेवेन मारिष ।। नकुलके छोटे भाई महातेजस्वी सहदेवके नामसे विख्यात हैं। माननीय महाराज! उन्हीं सहदेवने मुझे यहाँ भेजा है। अहं घटोत्कचो नाम भीमसेनसुतो बली । मम माता महाभागा हिडिम्बा नाम राक्षसी ।। मेरा नाम घटोत्कच है। मैं भीमसेनका बलवान पुत्र हूँ। मेरी सौभाग्यशालिनी माताका नाम हिडिम्बा है। वे राक्षसकुलकी कन्या हैं। पार्थानामुपकारार्थ चरामि पृथिवीमिमाम्‌ । आसीतू पृथिव्या: सर्वस्या महीपालो युधिष्ठिर: ।। मैं कुन्तीपुत्रोंका उपकार करनेके लिये ही इस पृथ्वीपर विचरता हूँ। महाराज युधिष्छिर सम्पूर्ण भूमण्डलके शासक हो गये हैं। राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहर्तुमुपचक्रमे । संदिदेश च स भ्रातृन्‌ करार्थ सर्वतोदिशम्‌ ।। उन्होंने क्रतुश्रेष्ठ राजसूयका अनुष्ठान करनेकी तैयारी की है। उन्हीं महाराजने अपने सब भाइयोंको कर वसूल करनेके लिये सब दिशाओंमें भेजा है। वृष्णिवीरेण सहित: संदिदेशानुजान्‌ नृप: । उदीचीमर्जुनस्तूर्ण करार्थ समुपाययौ ।। वृष्णिवीर भगवान्‌ श्रीकृष्णके साथ धर्मराजने जब अपने भाइयोंको दिग्विजयके लिये आदेश दिया, तब महाबली अर्जुन कर वसूल करनेके लिये तुरंत उत्तर दिशाकी ओर चल दिये। गत्वा शतसहस्राणि योजनानि महाबल: । जित्वा सर्वान्‌ नृपान्‌ युद्धे हत्वा च तरसा वशी ।। स्वर्गद्वारमुपागम्य रत्नान्यादाय वै भृशम्‌ । उन्होंने लाख योजनकी यात्रा करके सम्पूर्ण राजाओंको युद्धमें हराया है और सामना करनेके लिये आये हुए विपक्षियोंको वेगपूर्वक मारा है। जितेन्द्रिय अर्जुनने स्वर्गके द्वारतक जाकर प्रचुर रत्न-राशि प्राप्त की है। अश्वांश्व विविधान्‌ दिव्यान्‌ सर्वानादाय फाल्गुन: ।। धनं बहुविध॑ राजन्‌ धर्मपुत्राय वै ददौ । नाना प्रकारके दिव्य अश्व उन्हें भेंटमें मिले हैं। इस प्रकार भाँति-भाँतिके धन लाकर उन्होंने धर्मपुत्र युधिष्ठिरकी सेवामें समर्पित किये हैं। भीमसेनो हि राजेन्द्र जित्वा प्राचीं दिशं बलातू ।। वशे कृत्वा महीपालान्‌ पाण्डवाय धनं ददौ | राजेन्द्र! युधिष्ठिरके दूसरे भाई भीमसेनने पूर्व दिशामें जाकर उसे बलपूर्वक जीता है और वहाँके राजाओंको अपने वशमें करके पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको बहुत धन अर्पित किया है। दिशं प्रतीचीं नकुल: करार्थ प्रययौ तथा ।। सहदेवो दिशं याम्यां जित्वा सर्वान्‌ महीक्षित: । नकुल कर लेनेके लिये पश्चिम दिशाकी ओर गये हैं और सहदेव सम्पूर्ण राजाओंको जीतते हुए दक्षिण दिशामें बढ़ते चले आये हैं। मां संदिदेश राजेन्द्र करार्थमिह सत्कृत: ।। पार्थानां चरितं तुभ्यं संक्षेपात्‌ समुदाह्तम्‌ । राजेन्द्र! उन्होंने बड़े सत्कारपूर्वक मुझे आपके यहाँ राजकीय कर देनेके लिये संदेश भेजा है। महाराज! पाण्डवोंका यह चरित्र मैंने अत्यन्त संक्षेपमें आपके समक्ष रखा है। तमवेक्ष्य महाराज धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ ।। पावकं राजसूयं च भगवनन्‍्तं हरिं प्रभुम्‌ । एतानवेक्ष्य धर्मज्ञ कर त्वं दातुमरहसि ।। आप धर्मराज युधिष्ठिरकी ओर देखिये, पवित्र करनेवाले राजसूययज्ञ तथा जगदीश्वर भगवान्‌ श्रीहरिकी ओर भी ध्यान दीजिये। धर्मज्ञ नरेश! इन सबकी ओर दृष्टि रखते हुए आपको मुझे कर देना चाहिये। वैशम्पायन उवाच तेन तद्‌ भाषितं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रो विभीषण: । प्रीतिमानभवद्‌ राजन्‌ धर्मात्मा सचिवै: सह ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! घटोत्कचकी वह बात सुनकर धर्मात्मा राक्षसराज विभीषण अपने मन्त्रियोंके साथ बड़े प्रसन्न हुए। स चास्य॒ प्रतिजग्राह शासन प्रीतिपूर्वकम्‌ । तच्च कालकृतं धीमानभ्यमन्यत स प्रभु:,विभीषण ने प्रेमपूर्वक ही उनका शासन स्वीकार कर लिया। शक्तिशाली एवं बुद्धिमान्‌ विभीषणने उसे कालका ही विधान समझा

laṅkām abhimukho rājan samudram avalokayat | kūrma-grāha-jhaṣākīrṇaṁ nakrair mīnais tathākulam ||

Vaiśaṃpāyana said: “O King, as he set out facing Laṅkā, Ghaṭotkaca looked upon the ocean. It was crowded with turtles, crocodiles, great aquatic creatures, and swarms of fish.” The scene underscores the vastness of the crossing and the formidable natural world that frames his diplomatic mission—an errand undertaken not for conquest alone, but to gather lawful tribute for Yudhiṣṭhira’s Rājasūya, a rite that demands recognition of rightful sovereignty.

लङ्काम्Lanka (as destination)
लङ्काम्:
Karma
TypeNoun
Rootलङ्का
FormFeminine, Accusative, Singular
अभिमुखःfacing/towards
अभिमुखः:
Karta
TypeAdjective
Rootअभिमुख
FormMasculine, Nominative, Singular
राजन्O king
राजन्:
TypeNoun
Rootराजन्
FormMasculine, Vocative, Singular
समुद्रम्the ocean
समुद्रम्:
Karma
TypeNoun
Rootसमुद्र
FormMasculine, Accusative, Singular
अवलोकयत्looked at/saw
अवलोकयत्:
TypeVerb
Rootअवलोक्
FormImperfect (Laṅ), 3, Singular, Parasmaipada
कूर्मturtles
कूर्म:
TypeNoun
Rootकूर्म
FormMasculine, Stem (in compound), —
ग्राहcrocodiles/alligators
ग्राह:
TypeNoun
Rootग्राह
FormMasculine, Stem (in compound), —
झषfish (large fish)
झष:
TypeNoun
Rootझष
FormMasculine, Stem (in compound), —
आकीर्णम्filled, crowded
आकीर्णम्:
TypeAdjective
Rootआकीर्ण
FormMasculine, Accusative, Singular
नक्रैःwith crocodiles
नक्रैः:
Karana
TypeNoun
Rootनक्र
FormMasculine, Instrumental, Plural
मीनैःwith fish
मीनैः:
Karana
TypeNoun
Rootमीन
FormMasculine, Instrumental, Plural
तथाand also/likewise
तथा:
TypeIndeclinable
Rootतथा
कुलम्mass/collection (multitude)
कुलम्:
Karma
TypeNoun
Rootकुल
FormNeuter, Accusative, Singular
शुक्तिoyster-shell
शुक्ति:
TypeNoun
Rootशुक्ति
FormFeminine, Stem (in compound), —
व्रातैःwith heaps/groups
व्रातैः:
Karana
TypeNoun
Rootव्रात
FormMasculine, Instrumental, Plural
समाकीर्णम्thoroughly filled
समाकीर्णम्:
TypeAdjective
Rootसम्-आ-कीर्ण
FormMasculine, Accusative, Singular
शङ्खानाम्of conches
शङ्खानाम्:
TypeNoun
Rootशङ्ख
FormMasculine, Genitive, Plural
निचयheap, accumulation
निचय:
TypeNoun
Rootनिचय
FormMasculine, Stem (in compound), —
आकुलम्confused/teeming, crowded
आकुलम्:
TypeAdjective
Rootआकुल
FormNeuter, Accusative, Singular

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśaṃpāyana
J
Janamejaya
G
Ghaṭotkaca
L
Laṅkā
S
samudra (ocean)
K
kūrma (turtles)
G
grāha (crocodiles)
J
jhaṣa (fish)
N
nakra (aquatic beasts)
M
mīna (fish)

Educational Q&A

The verse supports the ethical frame of the episode: political authority (for the Rājasūya) is pursued through recognized channels—sending a messenger for tribute—while the immense ocean imagery highlights humility before forces larger than oneself, a reminder that power should operate within dharma rather than mere violence.

Ghaṭotkaca, acting as Sahadeva’s envoy for Yudhiṣṭhira’s Rājasūya preparations, travels toward Laṅkā and pauses to behold the ocean, described as densely populated with aquatic creatures—setting the scene for his arrival and diplomatic encounter with Vibhīṣaṇa.