Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
त॑ ते ददृशुरीशानं तेजोराशिमुमापतिम् | अनन्यसदृशं लोके भगवन्तमकल्मषम्,तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे जो नाना प्रकारकी विशेष तपस्याओंद्वारा मनकी सम्पूर्ण वृत्तियोंके निरोधका उपाय जानते हैं, जिन्हें अपनी ज्ञानस्वरूपताका बोध नित्य बना रहता है, जिनका अन्त:ः:करण सदा अपने वशमें रहता है, जगत्में जिनकी कहीं भी तुलना नहीं है, उन निष्पाप, तेजोराशि, महेश्वर भगवान् उमापतिका उन देवताओंने दर्शन किया
taṁ te dadṛśur īśānaṁ tejorāśim umāpatim | ananyasadṛśaṁ loke bhagavantam akalmaṣam | tapa ugraṁ samāsthāya niyame parame sthitāḥ |
ಆಗ ಅವರು ಈಶಾನನಾದ ಉಮಾಪತಿ ಮಹಾದೇವನನ್ನು ಕಂಡರು; ಅವನು ಅಪಾರ ತೇಜೋರಾಶಿ, ಲೋಕದಲ್ಲಿ ಸಮಾನರಿಲ್ಲದವನು, ಭಗವಂತ, ನಿರ್ಮಲನು. ಉಗ್ರ ತಪಸ್ಸನ್ನು ಆಶ್ರಯಿಸಿ ಪರಮ ಸಂಯಮ-ನಿಯಮಗಳಲ್ಲಿ ಸ್ಥಿರರಾಗಿ ಅವರು ಅವನನ್ನೇ ಶರಣಾದರು.
दुर्योधन उवाच