Karṇa’s advance against the Pāṇḍava host; Arjuna’s clash with the Saṃśaptakas (कर्णस्य पाण्डवसेनाप्रवेशः—अर्जुनस्य संशप्तकसंप्रहारः)
एवमस्त्विति तान् देव: प्रत्युक्त्वा प्राविशद् दिवम् ते तु लब्धवरा: प्रीता: सम्प्रधार्य परस्परम्,निबोध मनसा चात्र न ते कार्या विचारणा । दुर्योधन बोला--मद्रराज! मैं पुन: आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे सुनिये। प्रभो! पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जो घटना घटित हुई थी तथा जिसे महर्षि मार्कण्डेयने मेरे पिताजीको सुनाया था, वह सब मैं पूर्णरूपसे बता रहा हूँ। राजर्षिप्रवर! आप मन लगाकर इसे सुनिये, इसके विषयमें आपको कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये तप उग्र॑ समास्थाय नियमे परमे स्थिता: । उस समय देवताओंने दैत्योंको परास्त कर दिया था, यह हमारे सुननेमें आया है। राजन! दैत्योंके परास्त हो जानेपर तारकासुरके तीन पुत्र ताराक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली उग्र तपस्याका आश्रय ले उत्तम नियमोंका पालन करने लगे “एवमस्तु” (ऐसा ही हो) यों कहकर भगवान् ब्रह्मा अपने धामको चले गये। वरदान पाकर वे तीनों असुर बड़े प्रसन्न हुए और परस्पर विचार करके उन्होंने दैत्य-दानव-पूजित, अजर-अमर विश्वकर्मा महान् असुर मयका तीन पुरोके निर्माणके लिये वरण किया
evam astv iti tān devaḥ pratyuktvā prāviśad divam | te tu labdhavarāḥ prītāḥ sampradhārya parasparam ||
ದೇವನು “ಏವಮಸ್ತು” ಎಂದು ಉತ್ತರಿಸಿ, ವರವನ್ನು ದಯಪಾಲಿಸಿ ಸ್ವರ್ಗಕ್ಕೆ ತೆರಳಿದನು. ವರಲಾಭದಿಂದ ಆ ಮೂವರೂ ಹರ್ಷಿತರಾಗಿ, ಪರಸ್ಪರ ಆಲೋಚಿಸಿ ಮುಂದಿನ ಕಾರ್ಯಕ್ಕೆ ಪ್ರವೃತ್ತರಾದರು.
दुर्योधन उवाच