Adhyāya 90: Babhruvāhana’s Reception and the Commencement of Yudhiṣṭhira’s Aśvamedha
कथं सक्तून् ग्रहीष्यामि भूत्वा धर्मोपघातक: । कल्याणवृत्ते कल्याणि नैवं त्वं वक्तुमहसि,श्वशुरने कहा--बेटी! हवा और धूपके मारे तुम्हारा सारा शरीर सूख रहा है--शिथिल होता जा रहा है। तुम्हारी कान्ति फीकी पड़ गयी है। उत्तम व्रत और आचारका पालन करनेवाली पुत्री! तुम बहुत दुर्बल हो गयी हो। क्षुधाके कष्टसे तुम्हारा चित्त अत्यन्त व्याकुल है। तुम्हें ऐसी अवस्थामें देखकर भी तुम्हारे हिस्सेका सत्तू कैसे ले लूँ। ऐसा करनेसे तो मैं धर्मकी हानि करनेवाला हो जाऊँगा। अत: कल्याणमय आचरण करनेवाली कल्याणि! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये
kathaṁ saktūn grahīṣyāmi bhūtvā dharmopaghātakaḥ | kalyāṇavṛtte kalyāṇi naivaṁ tvaṁ vaktum arhasi ||
ಮಾವನು ಹೇಳಿದನು—ಧರ್ಮಕ್ಕೆ ಉಪಘಾತ ಮಾಡುವವನಾಗಿ ನಾನು ಸತ್ತು (ಸಕ್ತು) ಅನ್ನು ಹೇಗೆ ತೆಗೆದುಕೊಳ್ಳಲಿ? ಕಲ್ಯಾಣವೃತ್ತಿಯ ಕಲ್ಯಾಣಿ, ನೀನು ಹೀಗೆ ಹೇಳಬಾರದು.
श्षशुर उवाच