Kārtavīrya–Samudra Saṃvāda and the Jāmadagnya Precedent (आश्वमेधिक पर्व, अध्याय २९)
अपन बछ। है २ >> - यह अध्याय क्षेपक हो तो कोई आश्चर्य नहीं; क्योंकि इसमें यह बात कही गयी है कि बुद्धि और इन्द्रियोंमें राग-द्वेषके रहते हुए भी विद्वान् कर्मोंमें लिप्त नहीं होता और यज्ञमें पशु-हिंसाका दोष नहीं लगता। किंतु यह कथन युक्तिविरुद्ध है। एकोनत्रिशो<ड ध्याय: परशुरामजीके द्वारा क्षत्रिय-कुलका संहार ब्राह्मण उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । कार्तवीर्यस्य संवाद समुद्रस्य च भाविनि,ब्राह्मणने कहा--भामिनि! इस विषयमें भी कार्तवीर्य और समुद्रके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया जाता है
brāhmaṇa uvāca | atrāpy udāharantīmam itihāsaṁ purātanam | kārtavīryasya saṁvādaṁ samudrasya ca bhāmini ||
ಬ್ರಾಹ್ಮಣನು ಹೇಳಿದರು—ಹೇ ಭಾಮಿನಿ! ಈ ವಿಷಯದಲ್ಲಿಯೂ ಒಂದು ಪುರಾತನ ಇತಿಹಾಸದ ಉದಾಹರಣೆ ಹೇಳುತ್ತಾರೆ—ಕಾರ್ತವೀರ್ಯನ ಮತ್ತು ಸಮುದ್ರನ ಸಂವಾದ.
ब्राह्मण उवाच