धर्म-विजय की सीढ़ी: अहंकार-रावण का क्षय और भक्ति-आधारित राज्यधर्म की प्रतिष्ठा। इस सोपान में 'जय' केवल युद्ध-फल नहीं, अपितु तीर्थ-दर्शन, ऋषि-संतोष, दान, स्नान, प्रनाम—इनसे शुद्ध हुई चेतना का 'घर-लौटना' है। लंका-विजय के बाद राम का यह आकाश-मार्ग 'अंतर्मार्ग' भी है: दंडक → चित्रकूट → यमुना → गंगा → प्रयाग → बेनी (काशी) → अवध; यानी वैराग्य से लोक-कल्याण और मर्यादा तक।
यह प्रकरण ‘लंका-विजय’ को बाह्य युद्ध-फल से उठाकर ‘अंतर्मार्ग’ बना देता है। विमान-यात्रा आकाश-मार्ग होते हुए भी चेतना का आरोह/परिष्कार है: दंडक→चित्रकूट→यमुना→गंगा→प्रयाग→बेनी(काशी)→अवध की परिक्रमा वैराग्य से लोक-कल्याण तक की सीढ़ी है। रावण का क्षय केवल शत्रु-वध नहीं, अहंकार-रूप रावण का क्षय है; इसलिए विजय के बाद तुरन्त तीर्थ-दर्शन, ऋषि-संतोष, दान, स्नान, प्रणाम आते हैं—ये ‘राजा’ के भीतर ‘भक्त’ की स्थापना हैं। तुलसी का संकेत: सगुण राम स्वयं तीर्थों को प्रणाम कराते हैं, जिससे तीर्थ-महिमा ईश्वर-निमित्त हो जाती है—धर्म का केंद्र व्यक्ति-गौरव नहीं, ईश्वर-समर्पण है। स्थापत्य-ध्वनि: ‘विजय’ का शिखर ‘विनय’ की नींव पर टिकता है।
Verse 1 (चौपाई)
यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा। उभय प्रकार सुजसु जग तोरा।। सुत सन कह दसकंठ रिसाई। असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई।। अबहीं ते उर संसय होई। बेनुमूल सुत भयहु घमोई।। सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा। चला भवन कहि बचन कठोरा।। हित मत तोहि न लागत कैसें। काल बिबस कहुँ भेषज जैसें।। संध्या समय जानि दससीसा। भवन चलेउ निरखत भुज बीसा।। लंका सिखर उपर आगारा। अति बिचित्र तहँ होइ अखारा।। बैठ जाइ तेही मंदिर रावन। लागे किंनर गुन गन गावन।। बाजहिं ताल पखाउज बीना। नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना।।
Verse 2 (दोहा/सोरठा)
सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास। परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास।।10।।
Verse 3 (चौपाई)
इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा। उतरे सेन सहित अति भीरा।। सिखर एक उतंग अति देखी। परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी।। तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए। लछिमन रचि निज हाथ डसाए।। ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला। तेहीं आसान आसीन कृपाला।। प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा। बाम दहिन दिसि चाप निषंगा।। दुहुँ कर कमल सुधारत बाना। कह लंकेस मंत्र लगि काना।। बड़भागी अंगद हनुमाना। चरन कमल चापत बिधि नाना।। प्रभु पाछें लछिमन बीरासन। कटि निषंग कर बान सरासन।।
Verse 4 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन। धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन।।11(क)।। पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक। कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक।।11(ख)।।
Verse 5 (चौपाई)
पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी। परम प्रताप तेज बल रासी।। मत्त नाग तम कुंभ बिदारी। ससि केसरी गगन बन चारी।। बिथुरे नभ मुकुताहल तारा। निसि सुंदरी केर सिंगारा।। कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई। कहहु काह निज निज मति भाई।। कह सुग़ीव सुनहु रघुराई। ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई।। मारेउ राहु ससिहि कह कोई। उर महँ परी स्यामता सोई।। कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा। सार भाग ससि कर हरि लीन्हा।। छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं। तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं।। प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा। अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा।। बिष संजुत कर निकर पसारी। जारत बिरहवंत नर नारी।।
Verse 6 (दोहा/सोरठा)
कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास। तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास।।12(क)।। पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान। दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान।।12(ख)।।
Verse 7 (चौपाई)
देखु बिभीषन दच्छिन आसा। घन घंमड दामिनि बिलासा।। मधुर मधुर गरजइ घन घोरा। होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा।। कहत बिभीषन सुनहु कृपाला। होइ न तड़ित न बारिद माला।। लंका सिखर उपर आगारा। तहँ दसकंघर देख अखारा।। छत्र मेघडंबर सिर धारी। सोइ जनु जलद घटा अति कारी।। मंदोदरी श्रवन ताटंका। सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका।। बाजहिं ताल मृदंग अनूपा। सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा।। प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना। चाप चढ़ाइ बान संधाना।।
Verse 8 (दोहा/सोरठा)
छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान। सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान।।13(क)।। अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग। रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग।।13(ख)।।
Verse 9 (चौपाई)
कंप न भूमि न मरुत बिसेषा। अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा।। सोचहिं सब निज हृदय मझारी। असगुन भयउ भयंकर भारी।। दसमुख देखि सभा भय पाई। बिहसि बचन कह जुगुति बनाई।। सिरउ गिरे संतत सुभ जाही। मुकुट परे कस असगुन ताही।। सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई।। मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ।। सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी।। कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू।।
Verse 10 (दोहा/सोरठा)
बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु।।14।।
Verse 11 (चौपाई)
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा।। भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला।। जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा।। श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी।। अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला।। आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा।। रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा।। उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना।।
Verse 12 (दोहा/सोरठा)
अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान।।15(क)।। अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ। प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ।।15(ख)।।
Verse 13 (चौपाई)
बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना।। नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं।। साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया।। रिपु कर रुप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा।। सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें।। जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई।। तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि।। मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ।।
Verse 14 (दोहा/सोरठा)
एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध। सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध।।16(क)।। फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।।16(ख)।।
Verse 15 (चौपाई)
इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई।। कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई।। सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी।। मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा।। नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना।। बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा।। बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ।। काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई।।
Verse 16 (दोहा/सोरठा)
प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु।।17(क)।। स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ।।17(ख)।।
Verse 17 (चौपाई)
बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई।। प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका।। पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भैंटा।। बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई।। तेहि अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई।। निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी।। एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं।। भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहीं जारी।। अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा।। बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई।।
Verse 18 (दोहा/सोरठा)
गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज।।18।।
Verse 19 (चौपाई)
तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा।। सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा।। आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए।। अंगद दीख दसानन बैंसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें।। भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना।। मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना।। गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा।। उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रौध बिसेषी।।
Verse 20 (दोहा/सोरठा)
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ।।19।।
Verse 21 (चौपाई)
कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर।। मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई।। उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती।। बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा।। नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा।। अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा।। दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी।। सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें।।
Verse 22 (दोहा/सोरठा)
प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि। आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि।।20।।
Verse 23 (चौपाई)
रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी।। कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई।। अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा।। अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना।। अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक।। गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु।। अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई।। दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई।। राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई।। सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें।।
Verse 24 (दोहा/सोरठा)
हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस। अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस।।21।
Verse 25 (चौपाई)
सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई।। तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा।। सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी।। खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ।। कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी।। देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी।। कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी।। धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी।।
Verse 26 (दोहा/सोरठा)
जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु। लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु।।22(क)।। पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास। सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास।।22(ख)।।
Verse 27 (चौपाई)
तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद।। तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना।। तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ।। जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा।। सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला।। आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा।। सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा।। रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई।। जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन।। चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई।।
Verse 28 (दोहा/सोरठा)
सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ। फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ।।23(क)।। सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह। कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह।।23(ख)।। प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि। जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि।।23(ग)।। जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष। तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष।।23(घ)।। बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस। प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस।।23(ङ)।। हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक। जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक।।23(छ)।।
Verse 29 (चौपाई)
धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा।। नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई।। अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती।। मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना।। कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई।। बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा।। सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई।। देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा।। जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा।। पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही।। बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी।। कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते।। बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला।। खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई।। एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा।। कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा।।
Verse 30 (दोहा/सोरठा)
एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख।।24।।
Verse 31 (चौपाई)
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला।। जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई।। सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी।। भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला।। जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई।। जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे।। जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी।। सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी।।
Verse 32 (दोहा/सोरठा)
तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान। रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान।।25।।
Verse 33 (चौपाई)
सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी।। सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा।। जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा।। तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा।। राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा।। पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा।। बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन।। सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा।।
Verse 34 (दोहा/सोरठा)
सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि।। कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि।।26।।
Verse 35 (चौपाई)
सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई।। जौ खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही।। मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला।। तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें।। ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलहहिं भालु कीस चौगाना।। जबहिं समर कोपहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक।। तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा।। सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा।।
Verse 36 (दोहा/सोरठा)
कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि।।27।।
Verse 37 (चौपाई)
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई।। नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा।। मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा।। बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा।। दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा।। जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा।। तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा।। हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू।।
Verse 38 (दोहा/सोरठा)
सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस।।28।।
Verse 39 (चौपाई)
जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला।। नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची।। सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें।। आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे।। कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं।। लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ।। सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही।। सो भुजबल राखेउ उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली।। सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा।। इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा।।
Verse 40 (दोहा/सोरठा)
जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद।।29।।
Verse 41 (चौपाई)
अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही।। दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ।। बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला।। मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे।। नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा।। जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी।। तैं निसिचर पति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता।। जौं न राम अपमानहि डरउँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ।।
Verse 42 (दोहा/सोरठा)
तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ।।30।।
Verse 43 (चौपाई)
जौ अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई।। कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा।। सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी।। तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवन सव सम चौदह प्रानी।। अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही।। सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा।। रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी।। कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें।।
Verse 44 (दोहा/सोरठा)
अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास।।31(क)।। जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक।।31(ख)।।
Verse 45 (चौपाई)
जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा।। हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना।। कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी।। डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे।। गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर।। कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे।। आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे।। की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए।। कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू।। ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे।।
Verse 46 (दोहा/सोरठा)
तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास।।32(क)।। उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ।।32(ख)।।
Verse 47 (चौपाई)
एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु।। मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई।। पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा।। मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती।। रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी।। सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा।। याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें।। रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी।। गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं।।
Verse 48 (दोहा/सोरठा)
सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़।।33(क)।। तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम।।33(ख)।।
Verse 49 (चौपाई)
मै तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक।। असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं।। गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका।। मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा।। जुगति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई।। बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा।। साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा।। समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा।। जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी।। सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा।। इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना।। झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई।। पुनि उठि झपटहीं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती।। पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी।।
Verse 50 (दोहा/सोरठा)
कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ।।34(क)।। भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग।। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग।।34(ख)।।
Verse 51 (चौपाई)
कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे।। गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा।। गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई।। भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई।। सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई।। जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा।। उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा।। तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई।। पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना।। रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो।। हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई।। प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा।। जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी।।
Verse 52 (दोहा/सोरठा)
रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज।।35(क)।। साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ।।(ख)।।
Verse 53 (चौपाई)
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही।। रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई।। पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा। जाके दूत केर यह कामा।। कौतुक सिंधु नाघी तव लंका। आयउ कपि केहरी असंका।। रखवारे हति बिपिन उजारा। देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा।। जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा। कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा।। अब पति मृषा गाल जनि मारहु। मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु।। पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु। अग जग नाथ अतुल बल जानहु।। बान प्रताप जान मारीचा। तासु कहा नहिं मानेहि नीचा।। जनक सभाँ अगनित भूपाला। रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला।। भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही।। सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा।। सूपनखा कै गति तुम्ह देखी। तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी।।
Verse 54 (दोहा/सोरठा)
बधि बिराध खर दूषनहि लींलाँ हत्यो कबंध। बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध।।36।।
Verse 55 (चौपाई)
जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला। उतरे प्रभु दल सहित सुबेला।। कारुनीक दिनकर कुल केतू। दूत पठायउ तव हित हेतू।। सभा माझ जेहिं तव बल मथा। करि बरूथ महुँ मृगपति जथा।। अंगद हनुमत अनुचर जाके। रन बाँकुरे बीर अति बाँके।। तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू।। अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा।। काल दंड गहि काहु न मारा। हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा।। निकट काल जेहि आवत साईं। तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं।।
Verse 56 (दोहा/सोरठा)
दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु। कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु।।37।।
Verse 57 (चौपाई)
नारि बचन सुनि बिसिख समाना। सभाँ गयउ उठि होत बिहाना।। बैठ जाइ सिंघासन फूली। अति अभिमान त्रास सब भूली।। इहाँ राम अंगदहि बोलावा। आइ चरन पंकज सिरु नावा।। अति आदर सपीप बैठारी। बोले बिहँसि कृपाल खरारी।। बालितनय कौतुक अति मोही। तात सत्य कहु पूछउँ तोही।।। रावनु जातुधान कुल टीका। भुज बल अतुल जासु जग लीका।। तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए।। सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी।। साम दान अरु दंड बिभेदा। नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा।। नीति धर्म के चरन सुहाए। अस जियँ जानि नाथ पहिं आए।।
Verse 58 (दोहा/सोरठा)
धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस। तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस।।38(((क)।। परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार। समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार।।38(ख)।।
Verse 59 (चौपाई)
रिपु के समाचार जब पाए। राम सचिव सब निकट बोलाए।। लंका बाँके चारि दुआरा। केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा।। तब कपीस रिच्छेस बिभीषन। सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन।। करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा। चारि अनी कपि कटकु बनावा।। जथाजोग सेनापति कीन्हे। जूथप सकल बोलि तब लीन्हे।। प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए। सुनि कपि सिंघनाद करि धाए।। हरषित राम चरन सिर नावहिं। गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं।। गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा। जय रघुबीर कोसलाधीसा।। जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका।। घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहीं भेरी।।
Verse 60 (दोहा/सोरठा)
जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव। गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव।।39।।
Verse 61 (चौपाई)
कुंभकरन मन दीख बिचारी। हति धन माझ निसाचर धारी।। भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा। कियो मृगनायक नाद गँभीरा।। कोपि महीधर लेइ उपारी। डारइ जहँ मर्कट भट भारी।। आवत देखि सैल प्रभू भारे। सरन्हि काटि रज सम करि डारे।।। पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक। छाँड़े अति कराल बहु सायक।। तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं। जिमि दामिनि घन माझ समाहीं।। सोनित स्त्रवत सोह तन कारे। जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे।। बिकल बिलोकि भालु कपि धाए। बिहँसा जबहिं निकट कपि आए।।
Verse 62 (दोहा/सोरठा)
महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस। महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस।।69।।
Verse 63 (चौपाई)
भागे भालु बलीमुख जूथा। बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा।। चले भागि कपि भालु भवानी। बिकल पुकारत आरत बानी।। यह निसिचर दुकाल सम अहई। कपिकुल देस परन अब चहई।। कृपा बारिधर राम खरारी। पाहि पाहि प्रनतारति हारी।। सकरुन बचन सुनत भगवाना। चले सुधारि सरासन बाना।। राम सेन निज पाछैं घाली। चले सकोप महा बलसाली।। खैंचि धनुष सर सत संधाने। छूटे तीर सरीर समाने।। लागत सर धावा रिस भरा। कुधर डगमगत डोलति धरा।। लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी। रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी।। धावा बाम बाहु गिरि धारी। प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी।। काटें भुजा सोह खल कैसा। पच्छहीन मंदर गिरि जैसा।। उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका। ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका।।
Verse 64 (दोहा/सोरठा)
करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि। गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि।।70।।
Verse 65 (चौपाई)
सभय देव करुनानिधि जान्यो। श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो।। बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ। तदपि महाबल भूमि न परेऊ।। सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा। काल त्रोन सजीव जनु आवा।। तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा। धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा।। सो सिर परेउ दसानन आगें। बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें।। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा।। परे भूमि जिमि नभ तें भूधर। हेठ दाबि कपि भालु निसाचर।। तासु तेज प्रभु बदन समाना। सुर मुनि सबहिं अचंभव माना।। सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं। अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं।। करि बिनती सुर सकल सिधाए। तेही समय देवरिषि आए।। गगनोपरि हरि गुन गन गाए। रुचिर बीररस प्रभु मन भाए।। बेगि हतहु खल कहि मुनि गए। राम समर महि सोभत भए।।
Verse 66 (छंद)
संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी। श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी।। भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने। कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने।।
Verse 67 (दोहा/सोरठा)
निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम। गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम।।71।।
Verse 68 (चौपाई)
दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी। समर भई सुभटन्ह श्रम घनी।। राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा। जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा।। छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती। निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती।। बहु बिलाप दसकंधर करई। बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई।। रोवहिं नारि हृदय हति पानी। तासु तेज बल बिपुल बखानी।। मेघनाद तेहि अवसर आयउ। कहि बहु कथा पिता समुझायउ।। देखेहु कालि मोरि मनुसाई। अबहिं बहुत का करौं बड़ाई।। इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ। सो बल तात न तोहि देखायउँ।। एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना। चहुँ दुआर लागे कपि नाना।। इत कपि भालु काल सम बीरा। उत रजनीचर अति रनधीरा।। लरहिं सुभट निज निज जय हेतू। बरनि न जाइ समर खगकेतू।।
Verse 69 (दोहा/सोरठा)
मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास।। गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास।।72।।
Verse 70 (चौपाई)
सक्ति सूल तरवारि कृपाना। अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना।। डारह परसु परिघ पाषाना। लागेउ बृष्टि करै बहु बाना।। दस दिसि रहे बान नभ छाई। मानहुँ मघा मेघ झरि लाई।। धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना। जो मारइ तेहि कोउ न जाना।। गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं। देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं।। अवघट घाट बाट गिरि कंदर। माया बल कीन्हेसि सर पंजर।। जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर। सुरपति बंदि परे जनु मंदर।। मारुतसुत अंगद नल नीला। कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला।। पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन। सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन।। पुनि रघुपति सैं जूझे लागा। सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा।। ब्याल पास बस भए खरारी। स्वबस अनंत एक अबिकारी।। नट इव कपट चरित कर नाना। सदा स्वतंत्र एक भगवाना।। रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो। नागपास देवन्ह भय पायो।।
Verse 71 (छंद)
नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं। धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं।। तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई। एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई।।
Verse 72 (दोहा/सोरठा)
जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास। चलेउ निसाचर क्रुर्द्ध होइ त्यागि जिवन कै आस।।85।।
Verse 73 (चौपाई)
चलत होहिं अति असुभ भयंकर। बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर।। भयउ कालबस काहु न माना। कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना।। चली तमीचर अनी अपारा। बहु गज रथ पदाति असवारा।। प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें। सलभ समूह अनल कहँ जैंसें।। इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही। दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही।। अब जनि राम खेलावहु एही। अतिसय दुखित होति बैदेही।। देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना। उठि रघुबीर सुधारे बाना। जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे। सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे।। अरुन नयन बारिद तनु स्यामा। अखिल लोक लोचनाभिरामा।। कटितट परिकर कस्यो निषंगा। कर कोदंड कठिन सारंगा।।
Verse 74 (छंद)
सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो। भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो।। कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे। ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे।।
Verse 75 (दोहा/सोरठा)
सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार। जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार।।86।।
Verse 76 (चौपाई)
एहीं बीच निसाचर अनी। कसमसात आई अति घनी। देखि चले सन्मुख कपि भट्टा। प्रलयकाल के जनु घन घट्टा।। बहु कृपान तरवारि चमंकहिं। जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं।। गज रथ तुरग चिकार कठोरा। गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा।। कपि लंगूर बिपुल नभ छाए। मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए।। उठइ धूरि मानहुँ जलधारा। बान बुंद भै बृष्टि अपारा।। दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा। बज्रपात जनु बारहिं बारा।। रघुपति कोपि बान झरि लाई। घायल भै निसिचर समुदाई।। लागत बान बीर चिक्करहीं। घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं।। स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी। सोनित सरि कादर भयकारी।।
Verse 77 (छंद)
कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी। दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी।। जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने। सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने।।
Verse 78 (दोहा/सोरठा)
बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन। कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन।।87।।
Verse 79 (चौपाई)
मज्जहि भूत पिसाच बेताला। प्रमथ महा झोटिंग कराला।। काक कंक लै भुजा उड़ाहीं। एक ते छीनि एक लै खाहीं।। एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई। सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई।। कहँरत भट घायल तट गिरे। जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे।। खैंचहिं गीध आँत तट भए। जनु बंसी खेलत चित दए।। बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं। जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं।। जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं। भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं।। भट कपाल करताल बजावहिं। चामुंडा नाना बिधि गावहिं।। जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं। खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं।। कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं। सीस परे महि जय जय बोल्लहिं।।
Verse 80 (छंद)
बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं। खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं।। बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए। संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए।।
Verse 81 (दोहा/सोरठा)
रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार। मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार।।88।।
Verse 82 (चौपाई)
देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा। उपजा उर अति छोभ बिसेषा।। सुरपति निज रथ तुरत पठावा। हरष सहित मातलि लै आवा।। तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा। हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा।। चंचल तुरग मनोहर चारी। अजर अमर मन सम गतिकारी।। रथारूढ़ रघुनाथहि देखी। धाए कपि बलु पाइ बिसेषी।। सही न जाइ कपिन्ह कै मारी। तब रावन माया बिस्तारी।। सो माया रघुबीरहि बाँची। लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची।। देखी कपिन्ह निसाचर अनी। अनुज सहित बहु कोसलधनी।।
Verse 83 (छंद)
बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे। जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे।। निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी। माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी।।
Verse 84 (दोहा/सोरठा)
बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर। द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर।।89।।
Verse 85 (चौपाई)
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा। बिप्र चरन पंकज सिरु नावा।। तब लंकेस क्रोध उर छावा। गर्जत तर्जत सन्मुख धावा।। जीतेहु जे भट संजुग माहीं। सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं।। रावन नाम जगत जस जाना। लोकप जाकें बंदीखाना।। खर दूषन बिराध तुम्ह मारा। बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा।। निसिचर निकर सुभट संघारेहु। कुंभकरन घननादहि मारेहु।। आजु बयरु सबु लेउँ निबाही। जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं।। आजु करउँ खलु काल हवाले। परेहु कठिन रावन के पाले।। सुनि दुर्बचन कालबस जाना। बिहँसि बचन कह कृपानिधाना।। सत्य सत्य सब तव प्रभुताई। जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई।।
Verse 86 (छंद)
जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा। संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा।। एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं। एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं।।
Verse 87 (दोहा/सोरठा)
राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान। बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान।।90।।
Verse 88 (चौपाई)
कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर। कुलिस समान लाग छाँड़ै सर।। नानाकार सिलीमुख धाए। दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए।। पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा। छन महुँ जरे निसाचर तीरा।। छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई। बान संग प्रभु फेरि चलाई।। कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै। बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै।। निफल होहिं रावन सर कैसें। खल के सकल मनोरथ जैसें।। तब सत बान सारथी मारेसि। परेउ भूमि जय राम पुकारेसि।। राम कृपा करि सूत उठावा। तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा।।
Verse 89 (छंद)
भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे। कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे।। मँदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे। चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे।।
Verse 90 (दोहा/सोरठा)
तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल। राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल।।91।।
Verse 91 (छंद)
संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो। महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो।। हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले। रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले।।
Verse 92 (दोहा/सोरठा)
तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड। कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड।।95।।
Verse 93 (चौपाई)
अंतरधान भयउ छन एका। पुनि प्रगटे खल रूप अनेका।। रघुपति कटक भालु कपि जेते। जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते।। देखे कपिन्ह अमित दससीसा। जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा।। भागे बानर धरहिं न धीरा। त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा।। दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन। गर्जहिं घोर कठोर भयावन।। डरे सकल सुर चले पराई। जय कै आस तजहु अब भाई।। सब सुर जिते एक दसकंधर। अब बहु भए तकहु गिरि कंदर।। रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी। जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी।।
Verse 94 (छंद)
जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे। चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे।। हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे। मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे।।
Verse 95 (दोहा/सोरठा)
सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस। सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस।।96।।
Verse 96 (चौपाई)
प्रभु छन महुँ माया सब काटी। जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी।। रावनु एकु देखि सुर हरषे। फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे।। भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे। फिरे एक एकन्ह तब टेरे।। प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए। तरल तमकि संजुग महि आए।। अस्तुति करत देवतन्हि देखें। भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें।। सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल। अस कहि कोपि गगन पर धायल।। हाहाकार करत सुर भागे। खलहु जाहु कहँ मोरें आगे।। देखि बिकल सुर अंगद धायो। कूदि चरन गहि भूमि गिरायो।।
Verse 97 (छंद)
गहि भूमि पार् यो लात मार् यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो। संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो।। करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई। किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई।।
Verse 98 (दोहा/सोरठा)
तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप। काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप। 97।।
Verse 99 (चौपाई)
सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी। भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी।। मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा। धाए कोपि भालु भट कीसा।। बालितनय मारुति नल नीला। बानरराज दुबिद बलसीला।। बिटप महीधर करहिं प्रहारा। सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा।। एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी। भअगि चलहिं एक लातन्ह मारी।। तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ। नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ।। रुधिर देखि बिषाद उर भारी। तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी।। गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं। जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं।। कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी। महि पटकत भजे भुजा मरोरी।। पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे। सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे।। हनुमदादि मुरुछित करि बंदर। पाइ प्रदोष हरष दसकंधर।। मुरुछित देखि सकल कपि बीरा। जामवंत धायउ रनधीरा।। संग भालु भूधर तरु धारी। मारन लगे पचारि पचारी।। भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना। गहि पद महि पटकइ भट नाना।। देखि भालुपति निज दल घाता। कोपि माझ उर मारेसि लाता।।
Verse 100 (छंद)
उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा। गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा।। मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ। निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो।।
Verse 262 (छंद)
मामभिरक्षय रघुकुल नायक। धृत बर चाप रुचिर कर सायक।। मोह महा घन पटल प्रभंजन। संसय बिपिन अनल सुर रंजन।।1।। अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर। भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर।। काम क्रोध मद गज पंचानन। बसहु निरंतर जन मन कानन।।2।। बिषय मनोरथ पुंज कंज बन। प्रबल तुषार उदार पार मन।। भव बारिधि मंदर परमं दर। बारय तारय संसृति दुस्तर।।3।। स्याम गात राजीव बिलोचन। दीन बंधु प्रनतारति मोचन।। अनुज जानकी सहित निरंतर। बसहु राम नृप मम उर अंतर।।4।। मुनि रंजन महि मंडल मंडन। तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन।।5।।
māmabhirakṣaya raghukula nāyaka | dhṛta bara cāpa rucira kara sāyaka || moha mahā ghana paṭala prabhañjana | saṃśaya bipina anala sura rañjana ||1|| aguṇa saguṇa guṇa mandira sundara | bhrama tama prabala pratāpa divākara || kāma krodha mada gaja pañcānana | basahu nirantara jana mana kānana ||2|| biṣaya manoratha puñja kañja bana | prabala tuṣāra udāra pāra mana || bhava bāridhi mandara paramaṃ dara | bāray tāray saṃsṛti dustara ||3|| śyāma gāta rājīva bilocana | dīna bandhu pranaṭārati mocana || anuja jānakī sahita nirantara | basahu rāma nṛpa mama ura antara ||4|| muni rañjana mahi maṇḍala maṇḍana | tulasīdāsa prabhu trāsa bikhaṇḍana ||5||
Protect me, O leader of Raghu’s line, bearer of the noble bow and shining arrows. You are the wind that scatters the dense cloud-veil of delusion, the fire that burns the forest of doubt, the delight of the gods. (1) Nirguṇa yet Saguṇa, fair abode of all virtues; a sun of mighty splendor that dispels the darkness of error. Lion to the elephant-host of lust, anger, and pride—dwell unceasingly in the forest-garden of your servant’s mind. (2) You shatter the frost of sense-desires amassed like heaps; O generous one, whose heart is beyond the far shore. You are the churning-mountain for the ocean of becoming—burning and ferrying across this hard-to-cross transmigration. (3) Dark-limbed, lotus-eyed; friend of the poor, remover of the sorrow of the surrendered— with your younger brother and Janaki ever with you, O King Rama, abide within my heart. (4) Delighter of sages, ornament of the earth: O Lord of Tulsidas, destroyer of fear. (5)
Verse 263 (दोहा/सोरठा)
नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार। कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार।।115।।
nātha jabahiṁ kosalapurīṁ hoihi tilaka tumhāra | kṛpāsindhu maiṁ āuba dekhana carita udāra ||115||
O Lord, when in Ayodhya your coronation is to be performed—O ocean of grace—I shall come to behold your noble deeds.
Verse 264 (चौपाई)
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए।। नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी।। सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो। पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो।। दीन मलीन हीन मति जाती। मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती।। अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे।। देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा।। सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ। पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ।। सुनत बचन मृदु दीनदयाला। सजल भए द्वौ नयन बिसाला।।
kari binatī jaba sambhu sidhāe | taba prabhu nikaṭa bibhīṣanu āe || nāi carana siru kaha mṛdu bānī | binaya sunahu prabhu sāraṅgapānī || sakula sadala prabhu rāvana mār'yo | pāvana jasa tribhuvana bistār'yo || dīna malīna hīna mati jātī | mo para kṛpā kīnhi bahu bhāँtī || aba jana gṛha punīta prabhu kīje | majjanu kari'a samara śrama chīje || dekhi kosa mandira saṃpadā | dehu kṛpāla kapinh kahaुँ mudā || saba bidhi nātha mohi apanāi'a | puni mohi sahita avadhapura jāi'a || sunata bacana mṛdu dīnadayālā | sajala bhae dvau nayana bisālā ||
When Śambhu had offered his prayer and departed, Vibhīṣaṇa came near the Lord. Bowing, he laid his head at the Lord’s feet and spoke gently: “Hear my petition, O Lord who bears the bow. You have slain Rāvaṇa with all his hosts; your purifying fame has spread through the three worlds. I am poor and stained, of low understanding and lowly station—yet you have shown me grace in many ways. Now, O Lord, sanctify your servant’s house; bathe there and let the fatigue of battle be washed away. Behold the treasure of my palace; in your kindness grant joy to the monkeys as well. In every way, O Master, accept me as your own—and then take me with you to Ayodhya.” Hearing these gentle words, the compassionate Lord’s wide eyes filled with tears.
Verse 265 (दोहा/सोरठा)
तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात। भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात।।116(क)।। तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि। देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि।।116(ख)।। बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर। सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर।।116(ग)।। करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं। पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं।।116(घ)।।
tora kosa gṛha mora saba satya bacana sunu bhrāta | bharata dasā sumirata mohi nimiṣa kalpa sama jāta ||116(ka)|| tāpasa beṣa gāta kṛsa japata nirantara mohi | dekhauṁ begi so jatanu karu sakhā nihorauṁ tohi ||116(kha)|| bīteṁ avadhi jāuँ jauँ jīata na pāuँ bīra | sumirata anuj prīti prabhu puni-puni pulaka sarīra ||116(ga)|| karehu kalpa bhari rāju tumha mohi sumirehu mana māhiṁ | puni mama dhāma pāihahu jahāँ santa saba jāhiṁ ||116(gha)||
Your treasury and your home are all mine—hear my truthful word, brother. Remembering Bharata’s plight, each moment seems to me like an age. (116a) Wearing an ascetic’s garb, his body grown lean, he repeats my name unceasingly. Make haste and contrive some way that I may see him soon; friend, I beg you. (116b) When the term is fulfilled, I shall go—if I find him not alive, O brave one. As the Lord recalls his younger brother’s love, again and again his body thrills. (116c) Rule for an aeon, keeping me in your mind; then you shall attain my abode, where all the saints go. (116d)
Verse 266 (चौपाई)
सुनत बिभीषन बचन राम के। हरषि गहे पद कृपाधाम के।। बानर भालु सकल हरषाने। गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने।। बहुरि बिभीषन भवन सिधायो। मनि गन बसन बिमान भरायो।। लै पुष्पक प्रभु आगें राखा। हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा।। चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन। गगन जाइ बरषहु पट भूषन।। नभ पर जाइ बिभीषन तबही। बरषि दिए मनि अंबर सबही।। जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं। मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं।। हँसे रामु श्री अनुज समेता। परम कौतुकी कृपा निकेता।।
sunata bibhīṣana bacana rāma ke | haraṣi gahe pada kṛpādhāma ke || bānara bhālu sakala haraṣāne | gahi prabhu pada guna bimala bakhāne || bahuri bibhīṣana bhavana sidhāyo | mani-gana basana bimāna bharāyo || lai puṣpaka prabhu āgeṁ rākhā | haṁsi kari kṛpāsiṁdhu taba bhāṣā || caṛhi bimāna sunu sakhā bibhīṣana | gagana jāi baraṣahu paṭa bhūṣana || nabha para jāi bibhīṣana tabahī | baraṣi die mani aṁbara sabahī || joi joi mana bhāvai soi lehīṁ | mani mukha meli ḍāri kapi dehīṁ || haṁse rāmu śrī anuja sametā | parama kautūkī kṛpā niketā ||
Hearing Rama’s words, Vibhishana rejoiced and clasped the feet of the Abode of Mercy. All the monkeys and bears were glad; holding the Lord’s feet, they sang His stainless virtues. Then Vibhishana went to his palace, loaded the chariot with heaps of gems and garments, and brought the Pushpaka, placing it before the Lord. Smiling, the Ocean of Compassion spoke: “Mount the chariot, friend Vibhishana; go into the sky and shower garments and ornaments.” Vibhishana rose into the heavens at once and rained down gems and raiment for all. Each took what his heart desired; the monkeys even stuffed gems into their mouths and tossed them away. Rama laughed, with Lakshmana beside Him—He, the gracious refuge, delighted in playful wonder.
Verse 267 (दोहा/सोरठा)
मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद। कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद।।117(क)।। उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम। राम कृपा नहि करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम।।117(ख)।।
muni jehi dhyāna na pāvahiṁ neti neti kaha beda | kṛpāsiṁdhu soi kapinha sana karata aneka binoda ||117(ka)|| umā joga japa dāna tapa nānā makha brata nema | rāma kṛpā nahi karahiṁ tasi jasi niṣkevala prema ||117(kha)||
He whom sages cannot reach in meditation, and whom the Vedas describe by saying “Not this, not this”—that very Ocean of Mercy plays many a sport with the monkeys. O Uma, yoga, recitation, alms, austerity, manifold sacrifices, vows and disciplines do not draw Rama’s grace the way pure, exclusive love does.
Verse 268 (चौपाई)
भालु कपिन्ह पट भूषन पाए। पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए।। नाना जिनस देखि सब कीसा। पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा।। चितइ सबन्हि पर कीन्हि दाया। बोले मृदुल बचन रघुराया।। तुम्हरें बल मैं रावनु मार् यो। तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार् यो।। निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू। सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू।। सुनत बचन प्रेमाकुल बानर। जोरि पानि बोले सब सादर।। प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा। हमरे होत बचन सुनि मोहा।। दीन जानि कपि किए सनाथा। तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा।। सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं। मसक कहूँ खगपति हित करहीं।। देखि राम रुख बानर रीछा। प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा।।
bhālu kapinha paṭa bhūṣana pāe | pahiri pahiri raghupati pahiṁ āe || nānā jinsa dekhi saba kīsā | puni puni haṁsata kosalādhīsā || citai sabanhi para kīnhi dāyā | bole mṛdula bacana raghurāyā || tumhareṁ bala maiṁ rāvaṇu mār yo | tilaka bibhīṣana kahaṁ puni sār yo || nija nija gṛha aba tumha saba jāhū | sumirehu mohi ḍarapahu jani kāhū || sunata bacana premākula bānara | jori pāni bole saba sādara || prabhu joi kahahu tumahi saba sohā | hamare hota bacana suni mohā || dīna jāni kapi kie sanāthā | tumha trailoka īsa raghunāthā || suni prabhu bacana lāja hama marahīṁ | masaka kahūँ khagapati hita karahīṁ || dekhi rāma rukha bānara rīchā | prema magana nahiṁ gṛha kai īchā ||
The bears and monkeys received garments and ornaments; donning them again and again, they came before Raghupati. Seeing the various finery, all the monkeys laughed, and the Lord of Kosala too laughed again and again. Casting a compassionate glance on them all, the Raghu-king spoke gently: “By your strength I have slain Ravana, and again I have installed Vibhishana with the royal mark. Now each of you go back to your own home; remember me, and fear no one.” Hearing this, the monkeys, overwhelmed with love, joined their hands and replied with reverence: “Whatever you command is right; yet we are bewildered to hear such words while we still live. You took pity on the lowly and made the monkeys secure; you are the Lord of the three worlds, O Raghunath. Hearing your words, we would die of shame—can a mosquito ever do a service to the king of birds?” Rama saw the temper of the monkeys and bears: lost in love, they had no desire to return home.
Verse 269 (दोहा/सोरठा)
प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि। हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि।।118(क)।。 कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान। सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान।।118(ख)।। कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि। सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि।।118(ग)।।
prabhu prerit kapi bhālu saba rāma rūpa ura rākhi | haraṣa biṣāda sahita cale binaya bibidha bidhi bhāṣi ||118(ka)|| kapipati nīla rīchapati aṅgada nala hanumāna | sahita bibhīṣana apara je jūthapa kapi balavāna ||118(kha)|| kahi na sakahiṁ kachu prema basa bhari bhari locana bāri | sanmukha citavahiṁ rāma tana nayana nimeṣa nivāri ||118(ga)||
Commanded by the Lord, all the monkeys and bears set forth with Rama’s form enshrined in their hearts—moving on with mingled joy and sorrow, speaking their humble petitions in many ways. Nila the monkey-chief, Angada lord of the bears, Nala, Hanuman, with Vibhishana and the other mighty troop-leaders—so they went. Love choked their speech; their eyes filled again and again with tears, as they kept gazing on Rama’s body before them, refusing even to blink.
Verse 270 (चौपाई)
अतिसय प्रीति देख रघुराई। लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई।। मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो। उत्तर दिसिहि बिमान चलायो।। चलत बिमान कोलाहल होई। जय रघुबीर कहइ सबु कोई।। सिंहासन अति उच्च मनोहर। श्री समेत प्रभु बैठै ता पर।। राजत रामु सहित भामिनी। मेरु सृंग जनु घन दामिनी।। रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर। कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर।। परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी। सागर सर सरि निर्मल बारी।। सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा। मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा।। कह रघुबीर देखु रन सीता। लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता।। हनूमान अंगद के मारे। रन महि परे निसाचर भारे।। कुंभकरन रावन द्वौ भाई। इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई।।
atisaya prīti dekha raghurāī | linhē sakala bimāna caṛhāī || mana mahuṁ bipra carana siru nāyo | uttara disihi bimāna calāyo || calata bimāna kolāhala hoī | jaya raghubīra kahai sabu koī || siṁhāsana ati ūँca manohara | śrī sameta prabhu baiṭhai tā para || rājata rāmu sahita bhāminī | meru sṛṅga janu ghana dāminī || rucira bimānu caleu ati ātura | kīnhī sumana bṛṣṭi haraṣe sura || parama sukhada cali tri-bidha bayārī | sāgara sara sari nirmala bārī || saguna hohiṁ suṁdara cahuṁ pāsā | mana prasanna nirmala nabha āsā || kaha raghubīra dekhu rana sītā | lachimana ihāँ hatyo iṁdrajītā || hanūmāna aṅgada ke māre | rana mahi pare nisācara bhāre || kuṁbhakarana rāvaṇa dvau bhāī | ihāँ hate sura muni dukhadāī ||
Seeing their exceeding love, the Raghu-king had them all mount the aerial chariot. In his heart he bowed his head to the Brahmins’ feet, and set the chariot moving northward. As it flew, a great clamour rose; everyone cried, “Victory to Raghubir!” A lofty, enchanting throne stood within; the Lord sat upon it with Sri (Sita) beside Him. Rama shone with His beloved as though Mount Meru’s peak were wreathed in cloud and lightning. The splendid chariot sped on eagerly; the gods, rejoicing, rained down flowers. A supremely pleasant threefold breeze blew; the sea, lakes, and rivers showed limpid waters. Beautiful auspicious signs appeared on every side; the heart was glad, the sky bright and clear. Then Raghubir said, “Look, Sita, at the battlefield: here Lakshman slew Indrajit; Hanuman and Angada struck down mighty demons; here Kumbhakarna and Ravana, the two brothers, were killed—tormentors of gods and sages.”
Verse 271 (दोहा/सोरठा)
इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम। सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम।।119(क)।।
ihā̃ setu bāndhyo aru thāpeũ siva sukha dhāma | sītā sahita kṛpānidhi saṁbhūhi kīnha pranāma ||119(ka)||
Here he built the bridge and established a blissful shrine of Shiva; then the Treasure of Mercy, together with Sita, bowed in reverence to Shambhu.
Verse 272 (चौपाई)
जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम। सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम।।119(ख)।।
jahā̃-jahā̃ kṛpāsiṁdhu bana kīnha bāsa bisrāma | sakala dekhāe jānakihi kahe sabanhi ke nāma ||119(kha)||
Wherever in the forests the Ocean of Mercy had dwelt and rested, he showed Janaki each place and told her all their names.
Verse 273 (दोहा/सोरठा)
तुरत बिमान तहाँ चलि आवा। दंडक बन जहँ परम सुहावा।। कुंभजादि मुनिनायक नाना। गए रामु सब कें अस्थाना।। सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा। चित्रकूट आए जगदीसा।। तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा। चला बिमानु तहाँ ते चोखा।। बहुरि राम जानकिहि देखाई। जमुना कलि मल हरनि सुहाई।। पुनि देखी सुरसरी पुनीता। राम कहा प्रनाम करु सीता।। तीरथपति पुनि देखु प्रयागा। निरखत जन्म कोटि अघ भागा।। देखु परम पावनि पुनि बेनी। हरनि सोक हरि लोक निसेनी।। पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि। त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि।।।
turata bimāna tahā̃ cali āvā | daṇḍaka bana jahā̃ parama suhāvā || kuṁbhajādi muni-nāyaka nānā | gae rāmu saba keṁ asthānā || sakala ṛṣinhi sana pāi asīsā | citrakūṭa āe jagadīsā || tahā̃ kari munin̄hi kera santoṣā | calā bimānu tahā̃ te cōkhā || bahuri rāma jānakihi dekhāī | jamunā kali mala harani suhāī || puni dekhī surasarī punītā | rāma kahā pranāma karu sītā || tīrathapati puni dekhu prayāgā | nirakhata janma koṭi agha bhāgā || dekhu parama pāvani puni benī | harani soka hari loka nisēnī || puni dekhu avadhapurī ati pāvani | tribidha tāpa bhava roga nasāvani ||
At once the aerial car flew there—to lovely Dandaka forest. Rama went to the many hermitages of Agastya and other chief sages. Receiving blessings from all the seers, the Lord of the world came to Chitrakuta. There, having gladdened the sages’ hearts, the splendid car set out again. Once more Rama showed Janaki the fair Yamuna that washes away the age’s impurity. Then he showed her the holy Ganga; Rama said, ‘Bow, Sita.’ Next behold Prayaga, the lord of pilgrimages—at the very sight of it, sins of millions of births flee. Behold again the supremely purifying Triveni, dispeller of sorrow and the stairway to Hari’s realm. And now behold Ayodhya, most holy, that destroys the threefold torment and the world’s disease.
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